डिमाहा गांव में 200 वर्षों से हो रही मां दक्षिणेश्वर काली की पूजा, 1934 में बना था मंदिर; बंगला पद्धति से होती है आराधना
नवगछिया। गोपालपुर प्रखंड के डिमाहा गांव में मां दक्षिणेश्वर काली की पूजा करीब 200 वर्षों से बंगला पद्धति के अनुसार की जा रही है। मां काली के प्रति ग्रामीणों की गहरी आस्था है। यहां हर साल विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में फुलायस कर मांगी गई मुराद जरूर पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर बड़ी संख्या में महिलाएं मां के दरबार में खोइछा चढ़ाने पहुंचती हैं।
पूजा समिति ने बताया कि गंगा नदी के कटाव के कारण गांव के लोग विस्थापित हुए थे। इसके बाद वर्तमान स्थान पर गांव बसने के दौरान वर्ष 1934 में मां के मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। हालांकि, यहां मां दक्षिणेश्वर काली की पूजा की परंपरा करीब दो सौ साल पुरानी है।
ग्रामीणों के सहयोग से बना भव्य मंदिर
ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 2012 में मां से अनुमति लेने के बाद ग्रामीणों के सहयोग से भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर में पशु बलि की कोई परंपरा नहीं है। यहां श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मां की पूजा-अर्चना करते हैं।

उन्होंने बताया कि मां के दरबार से कोई भक्त निराश होकर नहीं लौटता है। सच्चे मन से फुलायस कर मां से जो भी मन्नत मांगी जाती है, मां उसे पूरा करती हैं। मनोकामना पूरी होने के बाद महिलाएं बड़ी संख्या में मां के दरबार में खोइछा चढ़ाकर अपनी श्रद्धा प्रकट करती हैं।
बंगला पद्धति से होती है मां की पूजा
मां दक्षिणेश्वर काली की पूजा बंगला पद्धति से कराई जाती है। इसके लिए खगड़ा गांव के विद्वान पंडित गंगानाथ झा और पंडित संतोष झा पूजा-अर्चना संपन्न कराते हैं। पूजा की पारंपरिक विधि और वर्षों पुरानी धार्मिक परंपरा आज भी कायम है।
पूजा समिति ने बताया कि पूजा के अवसर पर दो दिनों तक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही देवी जागरण का कार्यक्रम भी होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। मां काली की आराधना को लेकर डिमाहा गांव सहित आसपास के क्षेत्रों में विशेष उत्साह रहता है।
