आज चोरचन है यानी चौठ के चंद्रमा की पूजा। पूरे देश में जहां चौठ के चंद्रमा की पूजा नहीं होती है, वहीं मिथिलांचल में विशेष रूप से इसकी पूजा होती है। विधि-विधान से पूजा के बाद चंद्रमा के दर्शन के लिए शाम 6:18 बजे से लेकर रात नौ बजे तक शुभ मुहूर्त है। सभी व्रती महिलाएं और अन्य भक्तगण नए बर्तन में जमाया हुआ दही, विभिन्न प्रकार के फल और पकवान लेकर चन्द्रदेव के दर्शन करेंगी। दही और फल लेकर चौठ चंद्रमा के दर्शन में कोई दोष नहीं होता है। कहा जाता है आज ही के दिन भगवान विष्णु ने वराह भगवान के रूप में अवतार लेकर भक्तों के मनोरथों को पूर्ण किया था।


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देशभर में चौठ के चंद्रमा को माना जाता है अशुभ पर मिथिलांचल में होती है विशेष पूजा, दही और फल लेकर दर्शन करने से नहीं होता है दोष
चन्द्र दर्शन का मंत्र

सिह : प्रसेनमवधीत सिंहो जाम्बवता हत:, सुकुमारक मा रोदिस्तव ह्येष स्यमन्तक: मंत्र का जाप करते हुए चन्द्र दर्शन करें।
गणेशजी के हाथ से लड्‌डू गिरने के बाद चंद्रमा को आ गई थी हंसी, दिया था श्राप

एक बार गणेश जी को चंद्रलोक से भोज का आमंत्रण आया। गणेश जी ने वहां खूब लड्डू खाए और लौटते समय कुछ लड्‌डू साथ भी लेते आए। लौटते समय एक लड्‌डू उनके हाथ से गिर गए, जिसे देखकर चंद्रमा को हंसी आ गई। गणेश जी इससे नाराज हो गए और उन्होंने चांद को श्राप दिया कि जो तुम्हें देखेगा, उस पर चोरी का इल्जाम लग जाएगा। चंद्रदेव घबरा गए और श्राप वापस लेने का आग्रह किया। इसके बाद भगवान गणेश ने श्राप को चतुर्थी तक ही सीमित कर दिया। गणेश जी ने प्रसन्न होकर चन्द्रमा से कहा कि जो कोई नर-नारी भाद्र शुक्ल द्वितीया में आपका दर्शन कर चतुर्थी चन्द्र दर्शन करेंगे, उनको मिथ्या अपवाद कलंक नहीं लगेगा।

चौठी चंद्रमा के दर्शन से श्रीकृष्ण पर लगा मणि चुराने का आरोप

ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज कुमार मिश्र ने बताया कि श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार द्वारिकापुरी में सत्राजित नाम का एक राजा था, जिन्होंने सूर्य की आराधना करके स्यमंतक मणि प्राप्त की थी। उस मणि की विशेषता यह थी कि प्रतिदिन आठ भार सोना दिया करती थी। एक दिन राजा सत्राजित के भाई प्रसेन ने मणि को धारण कर लिया और शिकार पर चले गए। एक सिंह ने प्रसेन को मारकर मणि छीन ली। उस सिंह को भी मारकर रीक्षराज जामवंत मणि ग्रहण कर गुफा के अंदर छिप गए। इधर राजा सत्राजित ने द्वारिका पूरी में अफवाह फैला दी कि श्रीकृष्ण ने ही मणि के लोभ से मेरे भाई को मार दिया।

इस कलंक को मिटाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण जामवंत के गुफा में पहुंचे और 28 दिनों तक घोरयुद्ध किया। इसका कोई परिणाम नहीं निकला। इस दौरान जामवंत ने भगवान कृष्ण को पहचान लिया कि वे श्रीराम हैं। श्रीराम ने पुन: जन्म लेने का उनसे वादा किया था। इसके बाद रीक्षराज ने मणि लौटा दी और भगवान श्रीकृष्ण से अपनी बेटी जामवंती का विवाह करा दिया। श्रीकृष्ण ने मणि सत्राजित कौ लौटा दी। इसके बाद उन्होंने अपनी बेटी सत्यभामा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण से करा दिया। भगवान श्रीकृष्ण को यह कलंक इसलिए लगा था कि क्योंकि चतुर्थी के दिन उनकी नजर चंद्रमा पर पड़ गई थी। इससे मुक्ति पाने के लिए चौठी चंद्रमा की आराधना का विधान किया गया।

श्रापमुक्त होने के बाद मिथिलांचल में शुरू हुई थी चौठी चंद्रमा की पूजा

पंडित विजयानंद शास्त्री ने बताया कि चोरचन पर्व मिथिलांचल में विशेष रूप से मनाने का यह महत्व है कि चन्द्रदेव प्रत्यक्षदेव हैं। जिस समय चन्द्रदेव श्रापित थे, उस समय सभी ने चन्द्रमा का पूजन करना छोड़ दिया था। जब चन्द्रमा श्रापमुक्त हुए तब से मिथिलांचल में चन्द्रदेव की पूजा चोरचन के रूप में मनाई जाने लगी। जो भी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को विधिविधान एवं मंत्रों के द्वारा चन्द्रमा का आराधना एवं पूजन करेंगे, उनके जीवन में कभी भी मिथ्या कलंक नहीं लगेगा और सदैव उन पर चन्द्रमा की अनुकूलता बनी रहेगी।

By न्यूज़ डेस्क

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