पुत्र की लंबी आयु के लिए महिलाएं 22 सितंबर को जीवित्पुत्रिका व्रत करेंगी। 21 सितंबर को नहाय-खाय के साथ 24 घंटे का निर्जला उपवास शुरू करेंगी। इस दिन सुबह से ही गंगा घाटों पर महिलाओं की भीड़ लगी रहेगी। व्रती गंगा, तालाब व घरों में स्नान कर खल्ली, तेल, दातून देंगी और अपने पितरों को याद करेंगी। शनिवार को फल-पकवान, खज्जी, मटर, जनेऊ, पान-सुपाड़ी मटर आदि से बांस की डलिया भरेंगी। पारण 23 सितंबर को करेंगी। व्रत के दौरान महिलाएं एक बूंद पानी तक नहीं लेतीं हैं। व्रत को लेकर बाजार में पूजन सामग्रियोें की खरीदारी शुरू कर दी गई है।

ज्योतिषाचार्य पंडित अजीत पाण्डेय ने बताया कि हिन्दू समाज में व्रत करने की प्राचीन परंपरा रही है, लेकिन जितिया पर्व का विशेष महत्व है। यह व्रत अश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। पुत्रवती महिलाएं इस व्रत में निर्जल रहकर अपने संतान की मंगलकामना करती हैं। उन्होंने बताया कि काशी पंचांग के अनुसार नहाय-खाय 21 सितंबर को होगा। शनिवार को दिन 3:34 से अष्टमी का प्रवेश है जो रविवार 22 सितंबर को 2:40 तक है।

उदिया तिथि से रविवार के दिन 24 घंटे तक महिलाएं निर्जला उपवास रखेंगी। मिथिला पंचांग के अनुसार 21सितंबर को प्रातः काल में महिलाएं ओटघन करेंगी। शनिवार को दिन-रात्रि व्रत में रहेंगी। 22 सिंतबर को 2:49 तक महिलाएं व्रत करेगी, उसके बाद पारण करेंगी। गंगा स्नान के बाद महिलाओं ने घर में तरह-तरह के भोजन करेंगी। इस पर्व में महिलाओें ने खासकर दाल-भात, झिंगली, खमरूआ की सब्जी और नाेनी का साग परंपरा के तहत खाती है।

गंगा, तालाब व घरों में स्नान कर खल्ली, तेल, दातून देकर अपने पितरों को याद करेंगी व्रती

ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद पाण्डेय ने बताया कि इस व्रत में चील-सियारीन की कथा काफी प्रचलित है। एक बार कुछ महिलाएं जितिया व्रत करते देखकर चील-सियारिन ने भी इस पर्व को करने का निश्चय किया। चील तो भूखी-प्यासी रह गयी, लेकिन सियारिन नदी किनारे पर जलती हुई चिता को बुझाकर न केवल भरपेट मांस खाया, बल्कि एक टुकड़ा भी लेती आई। कुछ समय के बाद दोनों की मृत्यु हो गई। दोनों प्रयागराज के एक ब्राह्मण के घर उनकी बेटियां बनकर जन्म लिया।

चील शीलावती के नाम से और सियारिन कर्पूरावतिका नाम से जन्म लिया। बड़ी बहन शीलावती की शादी महाराज मलयकेतु के महामात्य बुद्धिसेन से हुआ। वहीं छोटी बहन कर्पूरा महाराज से विवाह कर महारानी बनी। पूर्व जन्म के पाप के कारण उसे जो संतान होता था मर जाता था। ईष्यावश उसने महाराज से शर्त कराकर अपनी बहन के सभी सातों पुत्रों को सात अलग-अलग टोकरों में भेज दिया। मगर राजा जीमूतवाहन ने सभी को जिंदा कर दिया। क्योंकि पूर्वजन्म में उनकी मां ने जितिया व्रत रखा था।

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By न्यूज़ डेस्क

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