भवानीपुर का दक्षिणेश्वर काली मंदिर : दो सौ सालों से जल रही आस्था की अखंड ज्योति

मां काली ने स्वयं दिए थे दर्शन, खेल-खेल में बच्चों द्वारा शुरू हुई थी यह पूजा परंपरा

नवगछिया (भागलपुर)। भवानीपुर गांव स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर आज भी श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का एक अद्भुत केंद्र है। कहा जाता है कि यह मंदिर करीब दो सौ वर्ष पुराना है और इसकी स्थापना किसी साधारण मानव की इच्छा से नहीं, बल्कि मां काली के प्रत्यक्ष आशीर्वाद से हुई थी।
दीपावली की रात्रि में यहां का वातावरण भक्तिमय हो उठता है। दूर-दराज के जिलों के अलावा पश्चिम बंगाल, झारखंड और असम से भी श्रद्धालु यहां मां काली की पूजा-अर्चना और चढ़ावा चढ़ाने के लिए पहुंचते हैं।


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मंदिर में मुख्य पुजारी प्रभात झा और अमित झा परंपरागत वैदिक विधियों से मां की आराधना करते हैं। इस दौरान पूरा गांव और आसपास के इलाके में “जय मां काली” के जयकारे गूंजते रहते हैं।


🔱 खेल-खेल में शुरू हुई थी पूजा की परंपरा

गांव के बुजुर्गों की मानें तो इस मंदिर की शुरुआत एक अद्भुत संयोग से हुई थी।
भवानीपुर के सोनरा बहियार में एक दिन कुछ बच्चों ने मिट्टी से मां काली की छोटी प्रतिमा बना ली। खेल-खेल में उन्होंने एक पाठा (बकरा) पकड़ लिया और मां काली का जयकारा लगाते हुए कुश (घास की तलवार) से उसकी बलि जैसा ड्रामा किया और बकरे का सिर धर से अलग हो गया।
बच्चों ने यह सब खेल समझकर किया, पर जैसे ही उन्होंने यह दृश्य देखा, सभी घबरा गए और घर भागे।

जब उन्होंने यह बात घर में बताई, तो बुजुर्गों ने तुरंत उस मिट्टी की प्रतिमा को गंगा जल में विसर्जित करने का निर्देश दिया। उसी रात एक आश्चर्यजनक घटना हुई —


🌙 भूसी पोद्दार को मां काली ने स्वप्न में दिए दर्शन

रात में गांव के भूसी पोद्दार, जो बालमुकुंद पोद्दार के पिता थे, उन्हें स्वप्न में मां काली के दर्शन हुए।
मां ने आदेश दिया —

“मेरी प्रतिमा गंगा से निकालो, मुझे भवानीपुर लाओ, और प्रतिवर्ष मेरे लिए बलि चढ़ाओ।”

सुबह होते ही भूसी पोद्दार ने ग्रामीणों की सहायता से गंगा से मिट्टी की प्रतिमा निकाली और भवानीपुर में स्थापित किया।
यहीं से शुरू हुई वह पूजा परंपरा, जो आज दो शताब्दियों से निरंतर जारी है।


🛕 सार्वजनिक मंदिर के रूप में हुआ विस्तार

वर्षों तक पोद्दार परिवार ने पूजा की पूरी व्यवस्था की।
जब परिवार पर आर्थिक भार बढ़ा और व्यवस्थापन कठिन होने लगा, तो ग्रामीणों ने एकमत होकर सार्वजनिक मंदिर निर्माण की योजना बनाई।
फिर भवानीपुर के लोगों ने मिलकर भव्य दक्षिणेश्वर काली मंदिर का निर्माण कराया।

आज भी भूसी पोद्दार के वंशजों द्वारा “नैन पड़ने” और “बलि देने” की प्रथा निभाई जाती है।
कहा जाता है कि मां की मूर्ति पर जैसे ही परिवार के वंशज की पहली नजर (नैन) पड़ती है, उसी क्षण बलि दी जाती है — यह परंपरा आज भी उसी आस्था के साथ निभाई जाती है।


💫 मां काली पूरी करती हैं भक्तों की हर मनोकामना

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से मां काली से मुराद मांगता है, उसकी इच्छा अवश्य पूरी होती है।
भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर मां को सोने-चांदी की बिंदी, नथ-टीका, झांप, मुंडमाला, पायल और पाठा की बलि जैसे विशेष चढ़ावे अर्पित करते हैं।
कई श्रद्धालु हर वर्ष अपनी सफलताओं और उपलब्धियों के बाद यहां धन्यवादी पूजा के लिए लौटते हैं।


🌃 दीपावली की रात भक्तिमय वातावरण में डूबा रहता है भवानीपुर

दीपावली की रात्रि को वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मां काली की प्रतिमा स्थापित की जाती है।
इसके अगले दिन रात्रि 8 बजे से देवी भक्ति जागरण और झांकी प्रदर्शन होता है।
संध्या 5 बजे प्रख्यात पंडितों द्वारा महाआरती की जाती है।
आसपास के गांवों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं।

पूरे गांव में दीये जलते हैं, ढोल-नगाड़ों की ध्वनि गूंजती है और वातावरण “जय मां काली” के जयकारों से थर्रा उठता है।


🕉️ मंदिर से जुड़ी भावनाएं आज भी जीवित

गांव के बुजुर्ग कहते हैं —

“यह सिर्फ मंदिर नहीं, बल्कि हमारे गांव की आत्मा है। मां काली यहां केवल प्रतिमा नहीं, साक्षात् शक्ति के रूप में विद्यमान हैं।”

भवानीपुर का यह दक्षिणेश्वर काली मंदिर आज भी आस्था, विश्वास और लोक परंपरा का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।
दीपावली के अवसर पर यहां का माहौल देखना हर भक्त के लिए आध्यात्मिक अनुभव से कम नहीं होता।

By न्यूज़ डेस्क

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