नवगछिया: नवगछिया अनुमंडल के गोपालपुर और इस्माईलपुर प्रखंडों में गंगा का कटाव हर साल हजारों लोगों के लिए नई मुसीबत लेकर आता है। कभी उपजाऊ खेतों और खुशहाल गांवों के लिए पहचाने जाने वाले इस इलाके में आज गंगा की तेज धारा लोगों की जमीन, घर और भविष्य को निगल रही है। कटाव का दायरा लगातार बढ़ने से खेती-किसानी पर आधारित सैकड़ों परिवारों की आजीविका संकट में पड़ गई है।
गंगा की बदलती धारा ने गोपालपुर और इस्माईलपुर के कई गांवों का भूगोल ही बदल दिया है। वर्षों के दौरान दर्जनों गांव पूरी तरह या आंशिक रूप से नदी में समा चुके हैं। हजारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि कटाव की भेंट चढ़ चुकी है। जिन खेतों में कभी धान, गेहूं और मक्का की लहलहाती फसलें दिखाई देती थीं, वहां अब सिर्फ गंगा की धारा बह रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि एक समय इस क्षेत्र के कई परिवार सैकड़ों बीघा जमीन के मालिक थे। खेती ही उनकी आय का मुख्य स्रोत थी और उसी से पूरे परिवार का पालन-पोषण होता था। लेकिन लगातार हो रहे कटाव ने उनकी जमीन और घर दोनों छीन लिए। आज उन्हीं परिवारों के युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, सूरत, लुधियाना और देश के अन्य शहरों में मजदूरी करने को मजबूर हैं।

कटाव का असर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन पर भी साफ दिखाई दे रहा है। गांवों से लगातार पलायन बढ़ रहा है, जिससे पारंपरिक ग्रामीण जीवन और सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित हो रहा है। कई परिवार अपने पुश्तैनी गांव छोड़कर दूसरे स्थानों पर बसने को मजबूर हुए हैं।
मानसून शुरू होते ही कटाव प्रभावित गांवों में लोगों की चिंता और बढ़ जाती है। गंगा का जलस्तर बढ़ने के साथ ही नदी का कटाव तेज हो जाता है। ऐसे में कई परिवार हर साल इस आशंका के साथ दिन गुजारते हैं कि कहीं इस बार उनका बचा हुआ घर भी नदी में समा न जाए। बरसात का मौसम उनके लिए राहत नहीं, बल्कि भय और असुरक्षा का प्रतीक बन चुका है।
ग्रामीणों का कहना है कि जल संसाधन विभाग और प्रशासन समय-समय पर कटाव रोकने के लिए बोल्डर, बांस और अन्य अस्थायी सुरक्षा कार्य कराते हैं। हालांकि गंगा की तेज धारा के सामने ये उपाय लंबे समय तक प्रभावी साबित नहीं हो पाते। लोगों का मानना है कि अब अस्थायी नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित स्थायी कटाव निरोधी योजना की जरूरत है, ताकि हर वर्ष होने वाले भारी नुकसान को रोका जा सके।
कटाव से सबसे अधिक परेशानी उन परिवारों को हो रही है जिनके घर और खेती योग्य जमीन दोनों गंगा में समा चुके हैं। ऐसे कई परिवार आज भी तटबंधों, सड़कों के किनारे या अस्थायी झोपड़ियों में जीवन बिताने को मजबूर हैं। विस्थापन के वर्षों बाद भी स्थायी पुनर्वास नहीं होने से लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। प्रभावित परिवारों का कहना है कि केवल राहत सामग्री से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्हें स्थायी आवास, रोजगार के अवसर और खेती के लिए वैकल्पिक भूमि उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
हर वर्ष गंगा का कटाव नवगछिया अनुमंडल के सैकड़ों परिवारों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर देता है। अब क्षेत्र के लोग सरकार से ऐसी दीर्घकालिक योजना की मांग कर रहे हैं, जिससे उनकी जमीन, घर और भविष्य को सुरक्षित रखा जा सके।

