ऋषव मिश्रा कृष्णा, नवगछिया : देश के जाने माने सोशलिस्ट, दिल्ली विश्व विद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर, सोशलिस्ट पार्टी के सुप्रीमो डा प्रेम कुमार सिंह की खासियत कहिए या खराबी, वह विचारों का खुलापन पसंद करने वाले इंसान हैं और इसलिए भी बेबाकी से अपनी बात रखते हैं. वह ये नहीं सोचते कि सामनेवाला क्या सोचेगा. सामनेवाले की राय से वह अपनी राय तय नहीं करते.
इसलिए कभी कभी उनके विरोधी उनसे खीझ भी जाएं, लेकिन उनकी तार्किक बातें उनकी सादगी से मेल खाते हुए सामनेवाले को सोचने को मजबूर जरूर करती है. उनसे बातचीत के दौरान यह मुझे भी अच्छा लगा. ख़ैर, पिछले अंश में मैंने देशभक्ति और राष्ट्रवाद पर डॉ सिंह के विचार सामने रखने की कोशिश की थी. इस बार प्रस्तुत है बातचीत की दूसरी कड़ी…..


ध्रुवीकरण की राजनीति पर उनका मानना है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही इसे बतौर टूल्स इस्तेमाल करती है. वह कहते हैं कि ये बात सही है कि वोटों के स्तर पर ध्रुवीकरण की राजनीति कांग्रेस भी करती है और दूसरी पार्टी भी करती रही है. बीजेपी का कोई पेटेंट नहीं रहा है. जिस यूपी में हम हार का बहुत अफसोस मनाते हैं वहां देखें 20, 25 साल से सेकुलर सरकारें रही है. एक दिन में अमित साह ने वहां जा कर ध्रुवीकरण नहीं कर दिया. सेकुलर ब्लाक की यह अफलता है. उसने भी सेकुलरिजम की वेल्यु को अपनी सुविधा के अनुसार बरतने का प्रयास किया. विरोध की राजनीति इस समय देश में है ही नहीं. ये एक ही पक्ष है.
एक सशक्त विपक्ष तैयार होने से पहले ढह गया

नवउदारवादी राजनीति या कॉर्पोरेट राजनीति जिसे हम कहते हैं. उसी के भीतर नीतीश एक चेहरा बनने का प्रयास कर रहे थे और उसके अंतर्गत जो विपक्ष है उसने उसे अपना चेहरा मानने से इनकार कर दिया. यही कारण रहा कि वे वहां चले गये. इस दौर में मुस्लिम आबादी में पहली बार मुस्लिम लीग एक पार्टी रही. केरल में उसके दो सांसदो और एक दो विधायक का योगदान रहा. लेकिन कई सारी मुस्लिम अस्मिता पर आधारित राजनीति गठित हुई और उसका पंजीकरण हुआ. हिंदू अस्मिता की राजनीति का एक रियक्शन यही है. दूसरी तरफ जो अपने को सेकुलर कहने वाली पार्टियां रही हैं, कांग्रेस से लेकर सपा, राजद बहुत सारी पार्टियां रही हैं इन्होंने भी अपने को कहीं न कहीं हिंदु अस्मिता से जोड़ने की कोशिश की. इस मायने में यह एक नाकारात्मक प्रवृति है. यह चलेगी अगर आप नवउदारवाद को चलायेंगे. आप नवउदारवाद को चैलेंज करिये और संप्रदायिकता की राजनीति अपने आप दूसरे नंबर पर आ जायेगी. क्योंकि छोटी लकीर के सामने में बड़ी लकीर खीचेंगे तभी उसका मुकाबला किया जा सकता है.
धर्म का राजनीतिकरण जो हो रहा है, वह दिशाविहीन कर रहा



