भागलपुर में मां काली की पूजा धूमधाम से की जाती है। यहां मां काली को एक नहीं बल्कि कई नामों से पुकारा जाता है। परबत्ती, इशाकचक, हबीबपुर मोमिन टोला में बुढ़िया काली, मंदरोजा में हड़बड़िया काली, रिकाबगंज में नवयुगी काली, उर्दू बाजार व बूढ़ानाथ में मसानी काली, बरमसिया काली, रति काली, जुबली काली, बमकाली आदि नाम से मां को पुकारा जाता है।
भागलपुर शहरी क्षेत्र व आसपास मां काली की 108 प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इसमें 75 से अधिक प्रतिमाएं विसर्जन शोभायात्रा में शामिल होती हैं। हर प्रतिमा की अलग खासियत होती है। 27 अक्टूबर की देर रात में मां काली की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी।
श्मशान की मिट्टी से हुई काली की स्थापना : उर्दू बाजार स्थित मसानी काली की पूजा सौ साल से अधिक समय से हो रही है। पूजा समिति के प्रवक्ता राजकुमार यादव ने बताया कि यहां पर काली की प्रतिमा की स्थापना श्मशान की मिट्टी से हुई थी इसलिए मसानी काली के नाम से मां को जाना जाता है।

बूढ़ानाथ में दिखता है आस्था का नजारा : काली पूजा के दौरान बूढ़ानाथ में आस्था का नजारा दिखता है। यहां एक किलोमीटर के अंदर बमकाली काली, ओमकार काली, मसानी काली, उपकार काली, बरमसिया काली, रति काली, जुबली काली व अम्बेदकर काली की प्रतिमा स्थापित होती है। पूजा व विसर्जन के दौरान बूढ़ानाथ शहर का बड़ा केंद्र रहता है। यहां विसर्जन शोभायात्रा के दौरान मां काली की भव्य तरीके से आरती होती है। इसके साथ बूढ़ानाथ चौक स्थित बरमसिया काली की पूजा सालों भर होती है।
नाव से विसर्जन के लिए जाती हैं मसानी काली : काली पूजा विसर्जन के दौरान अधिकांश प्रतिमाएं सड़क मार्ग से विसर्जन के लिए जाती हैं लेकिन बूढ़ानाथ मंदिर के पास स्थापित मां मसानी काली की प्रतिमा विसर्जन के लिए नाव पर जाती है। बताया गया कि जब बूढ़ानाथ के पास सभी प्रतिमाएं आ जाती हैं तो मां की प्रतिमा को नाव से विसर्जन के लिए मुसहारी घाट ले जाया जाता है।
ढाई सौ साल का इतिहास : काली महारानी केंद्रीय महासमिति के महामंत्री चिरंजीवी यादव धूरी ने बताया कि पूरे देश में कुछ ही जगहों में भागलपुर जितनी प्रतिमाएं स्थापित होती हैं। यहां 1954 में 36 जगहों पर ही मां काली की पूजा होती थी। बुजुर्गों का कहना है कि 200-250 वर्ष पूर्व महामारी फैली थी। इसको रोकने के लिए लोगों ने यहां मां काली की पूजा शुरू की थी।


