होलीका वास्तविक महत्व इससे कहीं अधिक है, होली हमारे स्वर्णिम पौराणिक महत्व को दर्शाती तो इसका आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व भी है सामाजिक दृष्टि से बहुत विशेष है तो इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है इसलिए होली वास्तव में एक सम्पूर्ण पर्व है।

हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन चैत्रकृष्ण प्रतिपदा में रंग अर्थत दुल्हैंडी का पर्व मनाया जाता है।

होलिका दहन की तिथि को माना जाता है सिद्ध रात्रि: होली का आध्यात्मिक और धार्मिक रूप से भी बड़ा महत्व है होलिका दहन अर्थात छोटी होली की रात्रि को एक परम सिद्ध रात्रि माना गया है जो किसी भी साधना जप तप ध्यान आदि के लिए बहुत श्रेष्ठ समय होता है। होलिका दहन वाले दिन किए गए दान-धर्म पूजन आदि का बड़ा विशेष महत्व होता है। साथ ही सामाजिक दृष्टि से देखें तो भी सभी व्यक्तियों का आपस में मिलकर विभिन्न प्रकार के रंगों के द्वारा हर्षपूर्वक इस त्यौहार को मनाना समाज को भी संगठित करता है। इसके अलावा इस त्यौहार का एक वैज्ञानिक महत्व भी है होली पर्व का समय वास्तव में संक्रमण काल या ऋतुपरिवर्तन का समय होता है जब वायुमण्डल में बैक्टीरिया अधिक होते हैं जिससे यह समय रोग वृद्धि का भी होता है।
इस बार होलिका दहन: इस बार होली का पर्व 12 और 13 मार्च को मनाया जाएगा जिसमे 12 मार्च रविवार के दिन होलिका दहन होगा और 13 मार्च सोमवार के दिन रंग अर्थात दुल्हैंडी का त्यौहार मनाया जाएगा। अब 12 तारिख को विशेष रूप से होलिका दहन के मुहूर्त को देखें तो फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। इसमें भी पूर्णिमा तिथि की उपस्थिति में ही होलिका दहन करने की शास्त्रोक्त परम्परा है। इस बार 12 मार्च को पूर्णिमा तिथि प्रातः काल से ही शुरू हो जाएगी और रात्रि 8 बजकर 23 मिन्ट तक रहेगी अर्थात रात्रि 8 बजकर 23 मिन्ट पर पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी। इसलिए रात्रि 8 :23 तक पूर्णिमा तिथि की उपस्थिति में होलिका दहन करना शाश्त्र सम्मत होगा। अब इसमें भी होलिका दहन के विशेष समय को देखें तो 12 मार्च को शाम 4 :30 से 6:00 के मध्य राहुकाल होने से यह समय होलोक दहन के लिए त्याज्य रहेगा और इसके बाद शाम 6 बजे से रात्रि 8 : 23 के बीच का समय होलिका दहन के लिए श्रेष्ठ होगा तो निष्कर्षतः 12 मार्च को रात्रि 8 :23 के बीच होलिका दहन किया जाएगा।

