देवी मैया के उपासक हैं और नवरात्र में व्रत रहते हैं या पहली मर्तबा व्रत रहने की ठानी है। अच्छी बात है, देवी खुश होंगी तो इच्छाएं पूरी होंगी और जिंदगी में तरक्की करेंगे। चैत्र प्रतिपदा और नवमी के दिन व्रत रखना चाहते हैं या पूरे नौ दिन, यह खबर आपको जरूर पडऩी चाहिए। खबर, आपकी मुराद को पूरा करने के लिए रास्ता दिखाएगी। क्या खाना है और क्या नहीं, यह जानना आपके लिए बेहद जरूरी है। दरअसल, व्रत के दिनों में जिस साबूदाना को भक्तगण धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं, उस साबूदाना में मांस होता है। चौकिए नहीं, यह साबित हो चुका है।

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शुद्ध वनस्पति होता है साबूदाना, लेकिन…

पहले समझिए साबूदाना होता क्या है? दरअसल सागो पाम नामक पौधे के तने और जड़ में पाए जाने वाले गूदे से साबूदाना बनाया जाता है। यानी सौ फीसदी शाकाहारी। अलबत्ता जड़-तने से गूदा निकालकर साबूदाना बनाने की प्रक्रिया के दौरान मांस के तत्वों का मिश्रण हो जाता है।

कैसे.आगे पढि़ए।
लाखों सूक्ष्म कीट और कीड़े-मकोड़े मरकर सड़ते हैं

साबूदाना बनाने का काम तमिलनाड़ु में बड़े पैमाने पर होता है। सागो पाम पौधे का गूदा सामान्यत: सिंगापुर, मलेशिया, जापान और नीदरलैंड से आयात किया जाता है। तमिलनाडु के सलेम जिले में साबूदाना बनाने का बड़ा हब है। इसके अलावा आंध्रप्रदेश के समरलाकोटा जिले में भी साबूदाना बनाने का काम होता है। बहरहाल, सागो पाम के गूदे को बड़े-बड़े टैंकों में कई दिनों तक सड़ाया जाता है। जिन टैंक में गूदे को सड़ाया जाता है, वह खुले मैदान मे होते हैं। इसके अलावा टैंक को खुला ही रखा जाता है। आसपास की लाइट्स के कारण रोजाना तमाम कीट-पतंगे टैंक में गिरते हैं और गूदे में फंसकर दम तोड़ देते हैं। इसके अलावा सडऩ के कारण गूदे में लाखों सूक्ष्म कीट भी पैदा हो चुके होते हैं।
पैरों से रौंदकर मिला दिये जाते हैं कीट-पतंगे

करीब 50-55 दिन तक सागो पाम का गूदा सडऩे के बाद मजदूरों के जरिए बाहर निकालकर हौद में एकत्र किया जाता है, जहां मजदूर इन्हें पैरों से रौंदते हैं। अक्सर देखा गया है कि गूदे को आटे की तरह सानने से पहले कीड़ों-मकोड़ों को अलग नहीं किया जाता है। करीब दो घंटे तक पैरों से रौंदककर गूदे को आटा जैसा बना लिया जाता है। अब इसे मशीनों की सहायता से साबूदाने यानी छोटे-छोटे दानों का आकार दिया जाता है। अंत में सूखने के बाद पॉलिश होती है। इस तरह व्रत और उपवास में फलाहार के रूप में इस्तेमाल होने वाला साबूदाना लाखों कीट-पतंगों के कारण मांसाहारी बन चुका होता है, लेकिन अनजान लोग धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं।
तमिलनाडु में व्रत के दौरान नहीं खाते हैं लोग
शायद इसी कारण तमिलनाडु के अधिकांश लोग व्रत के दौरान फल-दूध का सेवन तो खूब करते हैं, लेकिन साबूदाने से परहेज करते हैं। ऐसा कहते हैं कि तमिलनाडु में पांच बरस पहले एक एनजीओ ने जांच कराई थी तो साबूदाने में मांस के अवशेष मिले भी थे।

By न्यूज़ डेस्क

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