हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला शीतला अष्टमी (बासौड़ा) पर्व इस वर्ष 11 मार्च, बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु माता शीतला की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्यता की कामना करते हैं।
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ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद पाण्डेय के अनुसार शीतला अष्टमी से एक दिन पहले यानी 10 मार्च की शाम को घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। अगले दिन सुबह माता शीतला को इन्हीं पकवानों का भोग लगाया जाता है और श्रद्धालु उसी बासी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसी कारण इस पर्व को बासौड़ा भी कहा जाता है।
मान्यता है कि माता शीतला को गुड़ से बने व्यंजन विशेष रूप से प्रिय हैं। इस अवसर पर घरों में गुड़ के गुलगुले, गुड़ के चावल, मालपुआ और दही की राबड़ी जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। इन व्यंजनों को माता को अर्पित कर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। पंडित पाठक बताते हैं कि माता शीतला की पूजा करने से भक्तों को आरोग्यता का आशीर्वाद मिलता है और विशेष रूप से बच्चों को मौसमी बीमारियों से बचाव होता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस दिन होलिका दहन होता है, उस दिन बासौड़ा नहीं किया जाता। इस वर्ष अष्टमी तिथि का संयोग 11 मार्च, बुधवार को बन रहा है, इसलिए इसी दिन शीतला अष्टमी मनाना श्रेष्ठ माना गया है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है जुड़ा
इस परंपरा के पीछे वैज्ञानिक तर्क भी बताया जाता है। बदलते मौसम के दौरान एक दिन ठंडा या बासी भोजन ग्रहण करना शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और मौसमी बीमारियों से बचाव में मदद मिलती है।
इस दिन मंदिरों और घरों में माता शीतला की पूजा-अर्चना कर लोग परिवार के स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और बच्चों की लंबी आयु की कामना करते हैं। पूरा पर्व श्रद्धा और भक्ति के माहौल में मनाया जाता है।
