नवगछिया । कारगिल युद्ध मे दुश्मनों  को छठी का दूध याद दिलाने के बाद देश की रक्षा में अपनी जान देने वाले  मदरौनी निवासी गनर शहीद प्रभाकर  की शहादत के बाद मदरौनी में बना शहीद प्रभाकर का स्मारक वर्ष 2000 में कोसी नदी में विलीन हो गया। मां शांति देवी बेटे का अस्थि कलश को सीने से लगाये स्मारक को नदी में कटते देखती रही। इसके बाद उनका घर कटकर कोसी में विलीन हो गया। स्मारक और घर कटने के बाद रोती बिलखती शहीद की मां शांति देवी अपने शहीद बेटे के अस्थि कलश को सीने से दबाए गांव से विदा हुई। दिन रात पुत्र की याद में  मां बेटे को खोने का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई और सात वर्ष बाद दुनिया से चल बसी।

शहीद के स्मारक को नहीं बचा पाई सरकार

देश की रक्षा में अपनी जान देने वाले जांबाज प्रभाकर सिंह के शहीद स्मारक को भी सरकार कोसी कटाव से नहीं बचा पाई। शहीद होने के बाद सरकार द्वारा दिए गए  आश्वासन खोखला साबित हुए। शहीद के साथ साथ  गांव के सैकड़ों घर कटकर कोसी में विलीन हो गया।

शहादत पर लोगों को गर्व

ग्रामीण सह सामाजिक कार्यकर्ता रौशन सिंह बताते हैं कि शहीद प्रभाकर सिंह बचपन से मेहनती और साहसी थे। अंगुली खराब होने के कारण पहली बार सेना की बहाली में उन्हें छांट दिया गया था। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अंगुली के ठीक होने का इंतजार किया और दूसरी प्रयास में उन्हें सेना में नौकरी मिल गई। उनकी शहादत पर इस क्षेत्र की जनता को गर्व है।

शहीद प्रभाकर के घर के पास अभी कोसी की है  मुख्य धारा

मदरौनी में जहां शाहीद प्रभाकर का घर था वहां अभी कोसी की मुख्य धारा बह रही है। कोसी की भयावह विनाशलीला में समूचा मदरौनी कटकर बह गया और लोग बेघर होकर गांव छोड़कर दूसरी जगह  पर जाकर बस गए।

हर साल कोसी के बाढ़ का कहर झेलते है मदरौनी निवासी

हर साल मदरौनी के लोग कोसी का कहर झेलते है। कोसी के मुहाने पर होने के कारण यहां हर साल बाढ़ आता है। इसके अलावे कोसी का भीषण कटाव भी होता है।

बेटे के लिए मां खोज रही थी बहू

जब प्रभाकर शहीद हुए उनकी शादी नहीं हुई थी। मां शांति देवी बेटे के लिए दुल्हन की तलाश कर रही थी और बेटे से कहा भी था कि इस बार घर आने पर तुम्हारी शादी कर दूंगी। लेकिन कुदरत को शायद  कुछ और ही मंजूर था। क्या मालूम था कि बहू लाने का सपना देख रही मां के सामने बेटे का ही तिरंगा में लिपटा पार्थिव शरीर देखना पड़ेगा। घर में बड़ी बहन मधु, बड़ा भाई दिवाकर के बाद प्रभाकर सबसे छोटा था।

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By न्यूज़ डेस्क

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