नवगछिया। संतान की दीर्घायु, स्वस्थ जीवन, सुख-समृद्धि और बुद्धि की कामना से रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत इस बार विशेष संयोग के साथ मनाया जाएगा। पंडितों के अनुसार इस वर्ष जितिया के दौरान ‘खरजितिया’ योग बनने की मान्यता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस व्रत में महिलाएं स्वयं व्रती बनकर संतान के मंगल की कामना करती हैं।
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खरजितिया योग में व्रत शुरू करने की मान्यता
पंडित दयानंद पाण्डेय के अनुसार इस बार खरजितिया का विशेष संयोग बन रहा है। मान्यता के अनुसार जो महिलाएं पहली बार जितिया व्रत शुरू करना चाहती हैं, वे इस संयोग में व्रत का संकल्प ले सकती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इससे संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है।
जितिया व्रत में अष्टमी तिथि के दौरान डाली भरने की परंपरा भी है। महिलाएं संतान के मंगल और लंबी आयु की कामना से श्रद्धापूर्वक यह कठिन व्रत करती हैं।

अलग-अलग पंचांगों में तिथि को लेकर मत
इस वर्ष जितिया व्रत की तारीख को लेकर अलग-अलग पंचांगों में अंतर बताया जा रहा है। मिथिला पंचांग और काशी पंचांग में तिथि निर्धारण के अलग-अलग नियमों के कारण नहाय-खाय, व्रत और पारण की तारीख को लेकर अलग मत सामने आए हैं।
ऐसे में व्रती महिलाओं के लिए अपने स्थानीय पुरोहित अथवा परिवार की परंपरा के अनुसार मान्य पंचांग से तिथि और पारण का समय सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण रहेगा।
एक मत के अनुसार 1 अक्टूबर को ओठगन, 2 अक्टूबर को व्रत
पंडित सुभाष पाण्डेय के अनुसार 1 अक्टूबर की रात अंतिम प्रहर यानी ब्रह्ममुहूर्त में ओठगन होगा। इसके बाद 2 अक्टूबर को महिलाएं दिन-रात जितिया व्रत रखेंगी।
उनके अनुसार अष्टमी तिथि 2 अक्टूबर की सुबह 10:03 बजे से शुरू होकर 3 अक्टूबर की सुबह 7:38 बजे तक रहेगी। इसके बाद नवमी तिथि लगने पर व्रत का पारण किया जाएगा। इस गणना के अनुसार 3 अक्टूबर की सुबह 7:38 बजे के बाद पारण किया जाएगा।
दूसरे मत में 3 अक्टूबर को व्रत
वहीं पंडित रामजी मिश्र के अनुसार 3 अक्टूबर को अष्टमी तिथि प्रदोषकाल में विद्यमान रहेगी, इसलिए शास्त्रीय विधान के अनुसार इसी दिन जितिया व्रत रखने की बात कही गई है।
ज्योतिषाचार्य श्रीराम पाठक ने भी तिथि की गणना और शास्त्रीय मान्यता के आधार पर 3 अक्टूबर को व्रत के लिए उपयुक्त बताया है। साहित्यवाचस्पति डॉ. श्रीरामजी मिश्र रंजन के अनुसार तिथियों के हेरफेर के बीच इस बार जितिया पर्व खरजितिया के विशेष संयोग में पड़ रहा है।
संकट में कुछ पदार्थ लेने की मान्यता
गंगा पुलकित और विद्यापति पंचांग से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार व्रत के दौरान विशेष संकट की स्थिति में कुछ पदार्थों के सेवन की अनुमति मानी गई है। इनमें गंगाजल, शर्बत, शुद्ध देसी गाय का दूध या जूस शामिल बताए जाते हैं।
हालांकि, निर्जला व्रत के दौरान किसी भी प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी जोखिम की स्थिति में धार्मिक परंपरा के साथ व्यक्तिगत स्वास्थ्य को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित्पुत्रिका के नाम से जाना जाता है। जितिया की परंपराओं में बांस के पत्ते को वंशवृद्धि का प्रतीक माना जाता है। वहीं मरुआ की रोटी का भी विशेष महत्व बताया गया है।
ऐसे की जाती है भगवान जीमूतवाहन की पूजा
जितिया के दिन महिलाएं पूजा स्थल पर आंगन में पोखर बनाती हैं और उसमें पाकड़ का पेड़ स्थापित करती हैं। इसके बाद गोबर और मिट्टी से चिल्ली तथा सियारिन की आकृतियां बनाई जाती हैं।
पूजा स्थल के बीच जल से भरा कलश रखा जाता है। उसके ऊपर कुश से भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित की जाती है। महिलाएं कुश, तिल, पान, सुपारी और जल लेकर संकल्प करती हैं। इसके बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर भगवान जीमूतवाहन की कथा सुनी जाती है।
स्थानीय पंचांग से तय करें पारण
जितिया व्रत की तिथि को लेकर इस बार अलग-अलग पंचांगों में मत सामने आने के कारण व्रती महिलाओं में असमंजस की स्थिति हो सकती है। इसलिए व्रत और पारण का अंतिम समय अपने स्थानीय पुरोहित और परिवार की परंपरा में मान्य पंचांग से सुनिश्चित करना बेहतर रहेगा।
