खेल-खेल में हुआ चमत्कार, बनी मां वाम काली — बादुर तांती की बाल भक्ति से शुरू हुई एक अद्भुत परंपरा

नवगछिया (बिहपुर)। मां वाम काली मंदिर की ख्याति आज पूरे क्षेत्र में एक सिद्धपीठ के रूप में है। यहां दीपावली के अवसर पर दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह मंदिर अपनी तांत्रिक पूजा पद्धति, प्राचीन परंपरा और अलौकिक कथा के लिए प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना लगभग दो सौ वर्ष पहले एक गरीब बालक बादुर तांती ने खेल-खेल में कर दी थी, और तभी से यह स्थान आस्था, शक्ति और चमत्कार का प्रतीक बन गया।


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बादुर तांती की भक्ति और अद्भुत घटना

कथा के अनुसार, बादुर तांती एक गरीब परिवार का बालक था, जो नजदीकी गांव के एक कायस्थ परिवार के यहां बकरी चराने का कार्य करता था। वह बालक मन से अत्यंत भक्तिभाव से पूर्ण था। उसकी मां और पिता गरीब थे, लेकिन उनमें धार्मिक आस्था गहरी थी। कहा जाता है कि बादुर बचपन से ही मां काली का नाम जपता रहता था।

एक दिन वह अपने कुछ मित्रों के साथ खेल रहा था। बच्चों के खेल-खेल में उसने मिट्टी से मां काली की एक छोटी प्रतिमा बना डाली। सभी बच्चे उसके साथ पूजा का अभिनय करने लगे। उसी दौरान बादुर ने एक छागर (बकरी) को लाकर मां काली से बलि स्वीकार करने की प्रार्थना की। उसने सिर्फ कुश (घास) की एक डंडी से छागर पर हल्का प्रहार किया — लेकिन तभी एक अकल्पनीय चमत्कार घट गया।

बकरी दो भागों में विभाजित होकर गिर पड़ी

जैसे ही कुश से स्पर्श हुआ, बकरी दो हिस्सों में बंटकर गिर पड़ी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद सभी बच्चे डर से कांप उठे और वहां से भाग गए। छोटे बादुर को पहले तो कुछ समझ नहीं आया, लेकिन उसे विश्वास था कि यह मां की कृपा है। अगले दिन उसने पूरी घटना अपने पिता को बताई।

पहले तो पिता ने इस घटना पर विश्वास नहीं किया, पर जब बादुर ने कहा कि वह इसे दोबारा कर सकता है, तो उन्होंने उसे फिर वही करने को कहा। और चमत्कार पुनः हुआ — बकरी फिर दो भागों में विभक्त हो गई। पिता हैरान रह गए।

मालिक के सामने दोहराया गया चमत्कार

बादुर के पिता ने घटना अपने मालिक (कायस्थ परिवार) को बताई। मालिक ने स्वयं अपनी आंखों से देखने की बात कही। जब बादुर ने तीसरी बार उसी तरह मां की प्रतिमा के समक्ष पूजा की और कुश से छागर को स्पर्श किया, तो वही चमत्कार हुआ। इस बार पूरा परिवार स्तब्ध रह गया।

उस रात कायस्थ परिवार के मुखिया को मां काली ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा —

“डरो मत, मैं स्वयं यहां प्रकट हुई हूं। मेरी स्थापना करो, मैं तुम्हारे परिवार और इस गांव की रक्षा करूंगी।”

मां वाम काली की स्थापना और आस्था का विस्तार

अगले दिन गांव के लोगों ने मिलकर एक विशाल वृक्ष के नीचे मां वाम काली की पिंडी स्थापित की। उस क्षण से यह स्थान शक्ति उपासना का केंद्र बन गया। बादुर तांती के परिवार ने आजीवन उस स्थान की सेवा की। कहा जाता है कि उसी दिन से यहां की मिट्टी, वृक्ष और वातावरण में दैवीय ऊर्जा का वास है।

समय बीतता गया, पर यह स्थल बिहपुर प्रखंड का प्रमुख शक्तिपीठ बन गया। आज भी वह वृक्ष मां वाम काली मंदिर परिसर में मौजूद है, जिसके नीचे मां की पिंडी स्थापित की गई थी।

तांत्रिक विधि से होती है पूजा

मां वाम काली की पूजा तांत्रिक विधि से होती है। यहां दीपावली की रात विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दौरान तांत्रिक मंत्रोच्चार, दीप सज्जा और हवन के बीच श्रद्धालु मां के दर्शन करते हैं। कहा जाता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद यहां अवश्य पूरी होती है।

मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु बलि चढ़ाते हैं या मुंडन करवाकर धन्यवाद देते हैं। यहां सौ वर्षों से अधिक पुरानी परंपरा आज भी उसी आस्था के साथ निभाई जा रही है।

भक्ति, चमत्कार और आस्था का संगम

आज भी दीपावली की रात्रि में जब मंदिर परिसर में मां की आराधना होती है, तो सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु “जय मां वाम काली” के जयकारे लगाते हैं। मंदिर में तांत्रिक साधना, दीप प्रज्ज्वलन, भजन-कीर्तन और बलि अनुष्ठान देर रात तक चलते हैं।

लोगों की मान्यता है कि मां वाम काली के दरबार में जो भी सच्चे मन से आता है, उसकी हर मनोकामना पूरी होती है, और संतान, धन, स्वास्थ्य व सुख की प्राप्ति होती है।

By न्यूज़ डेस्क

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