नवगछिया (रामगढ़)। प्रखंड के रामगढ़ गांव में स्थित मां वामकाली मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मंदिर लगभग पाँच सौ वर्ष पुराना सिद्धपीठ है, जिसकी महिमा दूर-दूर तक फैली हुई है।
यहां हर वर्ष हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मां वामकाली के दरबार में खप्पर चढ़ाते हैं।
✨ सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध
स्थानीय लोगों के अनुसार, मां वामकाली का यह दरबार एक सिद्धस्थल है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से मां के दरबार में आकर अपनी इच्छा प्रकट करता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। मां की कृपा से न केवल भक्तों की झोली खुशियों से भर जाती है, बल्कि निसंतान महिलाओं की गोद भी भर जाती है।
यहां चढ़ाया जाने वाला खप्पर (मिट्टी या धातु का पात्र) भक्ति और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। यह विशेष परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
🏡 गांव की गृह देवी
रामगढ़ गांव के लोगों के लिए मां वामकाली केवल देवी नहीं, बल्कि गृह देवी हैं। किसी भी शुभ कार्य — चाहे विवाह हो, नया घर बनवाना हो या कोई पारिवारिक विवाद सुलझाना हो — उससे पहले ग्रामीण मां के दरबार में जाकर अनुमति मांगते हैं।
शुभ कार्य के आरंभ से पूर्व चढ़ावा चढ़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। जब कार्य सफलतापूर्वक पूरा हो जाता है, तब दोबारा मां के चरणों में धन्यवाद स्वरूप चढ़ावा अर्पित किया जाता है।
गांववासियों का कहना है कि मां की कृपा से इस गांव और आसपास के क्षेत्रों में कभी कोई बड़ी महामारी या प्राकृतिक आपदा नहीं आई।

🌼 मां की कृपा से उन्नति की राह
स्थानीय पुजारी सुभाष ठाकुर बताते हैं कि मां वामकाली के आशीर्वाद से आज इस गांव के कई लोग सरकारी और निजी विभागों में अच्छे पदों पर कार्यरत हैं। लोग मानते हैं कि मां की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आगमन होता है।
🪔 कालीपूजा पर उमड़ती है भक्तों की भीड़
हर वर्ष कालीपूजा के अवसर पर मंदिर परिसर में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
पूजा-अर्चना के दौरान दस हजार से अधिक श्रद्धालु मां के दरबार में खप्पर चढ़ाते हैं। यह खप्पर वे अपनी मन्नत पूरी होने के बाद अर्पित करते हैं।
कहा जाता है कि मां की कृपा से यहां आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता।
कटिहार, पूर्णिया, भागलपुर, बेगूसराय और आसपास के जिलों से बड़ी संख्या में लोग इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। पूजा के दिनों में मंदिर परिसर भक्तों की जयकारों से गूंज उठता है — “जय मां वामकाली!” के नारों से पूरा क्षेत्र श्रद्धामय वातावरण में डूब जाता है।
🌳 पांच सौ वर्ष पुराना इतिहास
मां वामकाली मंदिर का इतिहास लगभग पाँच सौ वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर के वर्तमान पुजारी सुभाष ठाकुर बताते हैं कि इस पवित्र स्थान की नींव मुनि बाबू मिश्र (मुन्नी बाबा) ने रखी थी।
किंवदंती है कि एक रात मुन्नी बाबू को स्वप्न में मां वामकाली के दर्शन हुए। मां ने उन्हें बताया कि वे पास के बहियार क्षेत्र में एक जंगल में निवास कर रही हैं और चाहती हैं कि उनकी गांव में स्थापना की जाए।
स्वप्न से जागने के बाद मुन्नी बाबू मां के बताए स्थान पर पहुंचे और वहां से मां की पिंडी को लेकर आए। उन्होंने गांव में एक बड़े पेड़ के नीचे मां की पिंडी स्थापित कर दी।
यहीं से मां वामकाली की पूजा प्रारंभ हुई और बाद में इसी स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया।
🔔 आस्था का प्रतीक
मां वामकाली मंदिर आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जन-जन की आस्था और विश्वास का केंद्र बन चुका है। यहां की परंपराएं, पूजा-विधियां और भक्ति का माहौल लोगों के दिलों में गहरी छाप छोड़ देता है।
मां के दरबार में जो भी भक्त आता है, उसके मन में एक अजीब-सी शांति और शक्ति का संचार होता है।
भक्तों का कहना है कि मां की कृपा से यहां आने वाला कोई भी व्यक्ति निराश नहीं लौटता — मां वामकाली हर भक्त की पुकार सुनती हैं और उनके जीवन में प्रकाश भर देती हैं।

