नारायणपुर (नवगछिया): गोगरी-नारायणपुर तटबंध पर स्थित नवटोलिया गांव का मां दक्षिणेश्वरी काली मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। करीब 150 वर्ष पूर्व स्थापित यह मंदिर आज भी सिद्ध साधकों, तांत्रिकों और श्रद्धालुओं के लिए दिव्य शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध है।


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🔱 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

कहा जाता है कि जहां आज यह मंदिर स्थित है, वह स्थल कभी गंगा और कोसी नदियों का संगम बिंदु हुआ करता था। प्राकृतिक ऊर्जा और जलधारा के संगम से उत्पन्न यह स्थान सदियों से योगियों और तांत्रिकों की साधना भूमि रहा है।

गांव के ही महापंडित स्वर्गीय गेणा लाल झा ने इस मंदिर की स्थापना की थी। उन्होंने वैदिक और तंत्रमार्गी विधि से मां काली की पिंडी की प्राण प्रतिष्ठा कर मंदिर को धार्मिक जीवन से भर दिया। उनके मार्गदर्शन में मां काली के साथ योगिनी-सेना की भी विशेष आराधना की परंपरा शुरू हुई, जो आज तक जारी है।

🕉️ वैदिक और तांत्रिक पूजा पद्धति

मां दक्षिणेश्वरी काली की पूजा अत्यंत विशिष्ट विधियों से की जाती है।
पंडित गेणा लाल झा द्वारा संकलित वैदिक और तंत्रमार्गी मंत्रों से यहां देवी सहित योगिनी-सेना की नियमित आराधना होती है। वर्तमान में उनके वंशज पंडित सुनील झा उर्फ पीपो झा मां की नित्य पूजा-अर्चना करते हैं।

मां की प्रतिमा भगवान शिव के वक्षस्थल पर खड़ी स्वरूप में स्थापित है। मूर्तिकार उपवास रखकर देवी की प्रतिमा का निर्माण करते हैं, ताकि उसमें पूर्ण आध्यात्मिक ऊर्जा और शक्ति का संचार हो सके। देवी के दोनों कानों पर बने दो गुप्तचर स्वरूप ‘श्रवणा’ और ‘श्रवणी’ को श्रुति परंपरा का प्रतीक माना जाता है।

🌸 योगिनी और सेना की आराधना

इस मंदिर की सबसे विशेष परंपरा है योगिनी और सेना की पूजा। शास्त्रों में कहा गया है कि ये सभी रूप मां काली की शक्ति का विस्तार हैं। इनके माध्यम से देवी की शक्ति साधक के जीवन में सक्रिय होती है और वह नकारात्मकता, भय तथा बाधाओं से मुक्त होता है।

भक्तों का विश्वास है कि यहां की गई सच्ची साधना और मां दक्षिणेश्वरी की आराधना सभी प्रकार की विपत्तियों से रक्षा करती है और मनोकामनाएं पूर्ण करती है।

🪔 कार्तिक अमावस्या की विशेष पूजा

पंडित मिथलेश कुमार उर्फ मुरली झा बताते हैं कि कार्तिक अमावस्या के दिन श्यामा पूजा के अवसर पर मां दक्षिणेश्वरी काली की विशेष आराधना की जाती है। इस दिन भगवती स्वरूपा योगमाया की पूजा वैदिक और तांत्रिक विधि दोनों से होती है।
इस पूजन में बलि की प्राचीन परंपरा भी निभाई जाती है, जो तंत्रमार्ग की महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है।

पूरे मंदिर परिसर में उस दिन हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। दीपों की रोशनी, घंटों की ध्वनि और ‘जय मां काली’ के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

🛕 मंदिर परिसर की विशेषता

मां दक्षिणेश्वरी काली मंदिर के साथ-साथ परिसर में गौरी-शंकर, गणेश-कार्तिकेय, सरस्वती, लक्ष्मी, हनुमान और अन्य देवी-देवताओं के भी सुंदर मंदिर बने हुए हैं। यह स्थान अब एक संपूर्ण आध्यात्मिक तीर्थक्षेत्र के रूप में विकसित हो चुका है।

मंदिर की नींव गांव के प्रेम खलीफा द्वारा रखी गई थी। समय के साथ ग्रामीणों के सहयोग से इसका पक्कीकरण और सौंदर्यीकरण किया गया।

🙏 आस्था और श्रद्धा का प्रतीक

मां काली के परम भक्त पंडित गेणा लाल झा की प्रतिमा भी मंदिर परिसर में स्थापित है। परंपरा के अनुसार, प्रतिमा का विसर्जन गंगा नदी में किया जाता है, जो इस मंदिर की पवित्रता और गंगा से इसके अटूट संबंध को दर्शाता है।

स्थानीय लोग बताते हैं कि जो भी सच्चे मन से यहां आकर मां से मन्नत मांगता है, उसकी झोली कभी खाली नहीं जाती। यह मंदिर न केवल श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि यह लोकविश्वास, तंत्रसाधना और वैदिक परंपरा का संगम स्थल भी है।

By न्यूज़ डेस्क

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