भागलपुर/नवगछिया। गंगा के इस पार और उस पार अब सिर्फ भौगोलिक दूरी नहीं, बल्कि जिंदगी भी दो हिस्सों में बंट चुकी है। विक्रमशिला सेतु के ध्वस्त होते ही मानो हजारों लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी अचानक थम गई है।

हर सुबह केला और सब्जी लेकर भागलपुर आने वाले ठेलेवालों की जिंदगी अब नाव और स्टीमर के सहारे चल रही है। मजदूरों के लिए काम तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों का सफर दोगुना हो चुका है, जबकि मरीजों के लिए अस्पताल तक पहुंचना अब जोखिम भरा बन गया है।

जो दूरी कभी कुछ मिनटों में तय हो जाती थी, वही सफर अब घंटों में भी पूरा नहीं हो पा रहा। गंगा, जो कभी जीवन का आधार थी, आज एक ऐसी दीवार बन गई है जो लोगों को उनके रोजगार, इलाज और रिश्तों से दूर कर रही है।

नवगछिया, कोसी और सीमांचल के इलाकों के लिए यह सेतु सिर्फ एक पुल नहीं था, बल्कि विकास की मजबूत कड़ी था। इसके टूटने से बाजार की रफ्तार धीमी पड़ गई है, छोटे व्यापारियों की कमर टूट गई है और आम लोगों की परेशानियां कई गुना बढ़ गई हैं।

हर किसी के मन में एक ही सवाल है—क्या यह दूरी फिर कभी कम हो पाएगी? क्या जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सकेगी?

विक्रमशिला सेतु का ध्वस्त होना सिर्फ एक संरचना का गिरना नहीं, बल्कि भरोसे, जुड़ाव और सहज जीवन के टूटने की कहानी बन गया है।

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By न्यूज़ डेस्क

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