कार्तिक अमावस्या की रात दीपावली में “लछमी घाेर, दरिद्दर बाहर” के जयघाेष के साथ सनाठी की हुक्कापाती मां भगवती या अन्य देवी-देवताअाें के समक्ष जल रहे दीये से जलाकर घर से बाहर जाकर खेलते हैं। हुक्कापाती जलाने के समय नये कपड़े पहन कर प्राचीन परंपरा के अनुसार, पगड़ी, टाेपी, गमछा, ताैलिया अादि से सिर ढकने के बाद ही खेलते हैं। हुक्कापाती खेलने के बाद बड़े-बुजुर्गों काे प्रणाम कर अाशीर्वाद लिया जाता है। महिलाएं भी पुराना सूप-डलिया काे घर-घर गली-गली अादि जगहाें पर बजाती हैं। हुक्कापाती खेलने का तात्पर्य हाेता है कि दरिद्रता दूर हाे अाैर घर में लक्ष्मी का वास हाे।
हुक्का-पाती जलाकर दस दिशाओं से महालक्ष्मी का आह्वान
ज्याेतिषाचार्य पंडित मनाेज कुमार मिश्र ने बताया कि सनाठी इसलिए जलायी जाती है कि उसकी पवित्र राेशनी से पितर लाेग अपने-अपने स्थान पर चले जाएं। ताकि घर में देवी-देवताअाें का वास हाे सके। असत्य पर सत्य की विजय तथा प्रकाश का पर्व दीपावली मन के ज्याेतिपुंज काे भी ज्ञान के प्रकाश से अलाैकिक करने का संदेश देता है। दीपावली का उत्सव प्रतीकात्मक रूप से फैले अमावस्या के अंधेरे काे दूर कर उसे महज दीये जलाकर उजाला फैलाने के उत्सव काे कहा जाता है।

हुक्कापाती जलाकर अन्न, धन, लक्ष्मी के अाने दरिद्रा बाहर जाने की कामना के साथ दस दिशाओं से महालक्ष्मी के आने कर पूजन किया जाएगा। पंडित मिश्र ने बताया कि अद्भुत रामायण में वर्णित है कि महाकाली श्री जानकी के द्वारा अविभूत हुए थे। इसी दिन लंकापति रावण का वध हुअा था। इस दिन भगवान श्रीराम जब अयाेध्या लाैटे ताे उनके स्वागत में अयाेध्या के नागरिकाें ने अपने-अपने घराें के अंदर व बाहर दीये जलाकर खुशी का इजहार किया था। तभी से परंपरागत तरीके से दीपावली का त्याेहार पूरे हर्षाेल्लास के साथ मनाया जा रहा है।


