दीपावली की रात जगमगाता है भक्ति का उजाला, श्रद्धालु झूम उठते हैं जयकारों से

नवगछिया | भागलपुर जिले के नवगछिया अनुमंडल क्षेत्र में दीपावली की रात का नजारा केवल रोशनी और पटाखों तक सीमित नहीं रहता — यह रात्रि देवी आराधना और तांत्रिक साधना की भी होती है। गोपालपुर प्रखंड का अभिया गांव और नारायणपुर प्रखंड का नवटोलिया गांव, इन दोनों स्थलों पर मां काली की पूजा अपने रहस्यमय तांत्रिक व वैदिक स्वरूप के लिए दूर-दराज़ तक प्रसिद्ध है।
यहां दीपावली की अमावस्या की रात श्रद्धालु, तांत्रिक, साधक और ग्रामीण एक साथ माता की आराधना में लीन होकर ऐसा वातावरण बना देते हैं, मानो पूरी धरती पर शक्ति का प्रवाह उतर आया हो।


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🔱 अभिया गांव: 102 साल पुरानी वैष्णवी काली की परंपरा

अभिया गांव में मां काली की पूजा की परंपरा एक सदी से भी अधिक पुरानी है। ग्रामीण बताते हैं कि लगभग 102 वर्ष पूर्व मां काली का एक फूस का मंदिर दियारा क्षेत्र में हुआ करता था। 1934 में गंगा कटाव से जब वह मंदिर विलुप्त हो गया, तब ग्रामीणों ने पुराने मंदिर की लकड़ी बेचकर, आपसी सहयोग और श्रद्धा से नया मंदिर गांव के भीतर स्थापित किया।
उस समय से आज तक यहां वैष्णवी काली की पूजा की जाती है। यह पूजा तांत्रिक विधि से सम्पन्न होती है, जिसमें विशेष मंत्रोच्चारण और गोपनीय साधनाएं की जाती हैं।

पूजा आरंभ करने से पहले बीरू टोला स्थित महंथ बाबा (कबूतरा स्थान) में पूजा कर “फुलायस” किया जाता है, अर्थात देवी की आज्ञा ली जाती है। आज्ञा प्राप्त होने के बाद ही मुख्य पूजा आरंभ होती है। दीपावली की रात माता के मंदिर का पट खुलते ही डुगडुगी और शंखनाद गूंज उठता है, और पूरा अभिया गांव मां के जयकारों से गूंजता है।

गांव के लोग मानते हैं कि मां काली उनके गांव की रक्षक देवी हैं। कोई भी मांगलिक या शुभ कार्य — विवाह, गृह प्रवेश या नई फसल की कटाई — बिना माता के दर्शन और पूजा के शुरू नहीं किया जाता।
ग्रामीण कहते हैं, “अभिया की पहचान ही मां काली हैं। यहां हर व्यक्ति का विश्वास है कि मां के दरबार में सच्चे मन से प्रार्थना करने वाला कभी खाली हाथ नहीं लौटता।”


🌕 नवटोलिया की दक्षिणेश्वरी काली: गंगा-कोसी संगम की साधना भूमि

नारायणपुर प्रखंड का नवटोलिया गांव, मां दक्षिणेश्वरी काली की साधना भूमि के रूप में प्रसिद्ध है। यह मंदिर लगभग 150 वर्ष पुराना बताया जाता है। कभी यहां गंगा और कोसी नदियों का संगम स्थल हुआ करता था, जिससे यह स्थान तांत्रिक और वैदिक साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता था।

गांव के ही महा पंडित स्वर्गीय गेना लाल झा ने इस मंदिर में देवी पिंडी की प्राण प्रतिष्ठा की थी। उन्होंने वैदिक और तंत्र दोनों मार्गों को मिलाकर पूजा की विशेष पद्धति तैयार की थी, जो आज भी उन्हीं के परंपरागत शिष्यों द्वारा निभाई जा रही है। वर्तमान में पंडित सुनील झा उर्फ पीपो झा माता की नित्य पूजा करते हैं।

यहां मूर्तिकार उपवास रखकर प्रतिमाएं बनाते हैं। देवी की प्रतिमा में मां काली भगवान शिव के वक्ष पर खड़ी रहती हैं। उनके दाएं-बाएं योगिनी सेना की मूर्तियां होती हैं। परंपरा के अनुसार, देवी के कानों में दो गुप्त चर की प्रतिमा बनायी जाती है — जिन्हें श्रवणा (दायां कान) और श्रवणी (बायां कान) कहा जाता है। यह परंपरा श्रुति मार्ग से चली आ रही है, जो मिथिला तंत्र साधना की विशिष्ट पहचान है।

यहां देवी की पूजा वैदिक और तांत्रिक दोनों विधियों से की जाती है। कार्तिक अमावस्या की रात, जिसे श्यामा पूजा की रात्रि कहा जाता है, मंदिर परिसर में हजारों श्रद्धालु उमड़ते हैं। इस रात मां काली को योगमाया के दक्षिणेश्वरी स्वरूप में पूजा जाता है।

मंदिर में आज भी बलि परंपरा प्रचलित है, जिसमें श्रद्धालु माता को बकरे की बलि चढ़ाकर अपनी मन्नतें मांगते हैं। दूर-दराज़ के भक्त यहां विशेष रूप से फूलायस करने आते हैं।

मंदिर का नींव गांव के ही प्रेम खलीफा ने रखा था। बाद में ग्रामीणों के सहयोग से इसका पक्कीकरण किया गया। परिसर में अन्य देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं — जिनमें भैरव बाबा, हनुमान जी, और योगिनी देवी का स्थान शामिल है।
मां काली के परम भक्त पंडित गेना लाल झा की प्रतिमा भी मंदिर में स्थापित है, जिन्हें श्रद्धालु “महंत बाबा” के नाम से पूजते हैं। प्रतिमा विसर्जन के बाद भक्तजन गंगा नदी में ही प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं।


🕉️ दो परंपराएं — एक शक्ति का संदेश

अभिया और नवटोलिया दोनों ही स्थानों पर पूजा की पद्धति भले अलग हो — एक में तांत्रिक वैष्णवी साधना, दूसरी में वैदिक-तंत्र मिश्रित साधना — परंतु दोनों स्थलों पर उद्देश्य एक ही है: मां शक्ति की आराधना और भक्तों के कल्याण की कामना।

इन दोनों गांवों की काली पूजा न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह नवगछिया की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। दीपावली की रात जब आसमान में दीपों की रोशनी होती है, तो धरती पर मां काली के दरबार में श्रद्धा की ज्योति जलती है — और यही ज्योति भक्तों के जीवन में प्रकाश भर देती है।

By न्यूज़ डेस्क

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