कोसी में समा गया पुनामा प्रतापनगर गांव, लेकिन आज भी कायम है मां दुर्गा की आस्था
नवगछिया। कोसी नदी की तेज धारा ने वर्ष 2003 में पुनामा प्रतापनगर गांव का अस्तित्व मिटा दिया, लेकिन गांव के लोगों की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवित है। गांव से विस्थापित होने के बाद भी लोगों ने अपनी परंपराओं को टूटने नहीं दिया। चंदेल राजपूत समाज के लोगों ने नवगछिया की राजेंद्र कॉलोनी में पुनामा प्रतापनगर दुर्गा मंदिर की स्थापना कर गांव की धार्मिक पहचान को नया ठिकाना दिया। आज यह मंदिर न सिर्फ श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि विस्थापित गांव की यादों और सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजे हुए है।
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कोसी के कटाव ने लोगों से उनका पुश्तैनी गांव और घर छीन लिया, लेकिन मां दुर्गा के प्रति विश्वास को नहीं डिगा सका। गांव से जुड़ी पूजा-पद्धति, धार्मिक रीति-रिवाज और परंपराओं को नई जगह पर भी उसी श्रद्धा के साथ निभाने का प्रयास किया गया। यही वजह है कि पुनामा प्रतापनगर के नाम से स्थापित यह मंदिर आज भी लोगों को अपने पुराने गांव और उसकी सांस्कृतिक पहचान से जोड़े हुए है।
बंगाली पद्धति से होती है मां दुर्गा की पूजा
पुनामा प्रतापनगर दुर्गा मंदिर की सबसे खास पहचान यहां की विशिष्ट पूजा-पद्धति है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, यहां मां दुर्गा की पूजा बंगाली पद्धति से की जाती है। पूजा-विधान में कामाख्या मंदिर की परंपराओं का भी अनुसरण किया जाता है। इस विशेष पूजा-पद्धति के कारण मंदिर की अपनी अलग धार्मिक पहचान है।

नवरात्र के दौरान मंदिर में मां दुर्गा की आराधना विधि-विधान से की जाती है। श्रद्धालु मां के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मंदिर में ज्योत पूजा का विशेष महत्व है। मंदिर के पुरोहित पंडित श्याम देव ठाकुर धार्मिक विधि-विधान के अनुसार पूजा संपन्न कराते हैं।
यहां की पूजा-पद्धति केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। विस्थापन के बाद भी इस पद्धति को बनाए रखना समाज के लोगों के लिए अपनी जड़ों को बचाए रखने जैसा है।
अष्टमी और नवमी को होती है विशेष पूजा
मंदिर में दुर्गापूजा के दौरान अष्टमी और नवमी का विशेष महत्व है। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, इन दोनों दिनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। वर्षों से यहां बलि देने की परंपरा चली आ रही है। अष्टमी से सार्वजनिक बलि शुरू होती है और अष्टमी-नवमी के अवसर पर करीब 700 से 800 पाठा की बलि दिए जाने की जानकारी दी गई है। नवमी के दिन भैंसे की बलि की परंपरा भी बताई जाती है।
बलि की यह परंपरा मंदिर की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हुई है। इस दौरान पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठान निर्धारित रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न कराए जाते हैं। मंदिर से जुड़ी इन परंपराओं के कारण यहां की दुर्गापूजा क्षेत्र के दूसरे पूजा स्थलों से अलग पहचान रखती है।
मनोकामना पूरी होने पर दंड प्रणाम करते हैं श्रद्धालु
पुनामा प्रतापनगर दुर्गा मंदिर में दंड प्रणाम की परंपरा भी विशेष रूप से प्रचलित है। मान्यता है कि जब किसी श्रद्धालु की मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वह मां दुर्गा के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए दंड प्रणाम करता है। भक्त अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार इस परंपरा का पालन करते हैं।
मंदिर से जुड़ी यह मान्यता लोगों की व्यक्तिगत आस्था और मां दुर्गा के प्रति समर्पण को दर्शाती है। श्रद्धालु मां से परिवार की खुशहाली, सुख-शांति और संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं। मनोकामना पूरी होने पर मंदिर में आकर आभार प्रकट करना उनके लिए धार्मिक विश्वास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विस्थापन के बाद भी नहीं भूले अपनी सांस्कृतिक विरासत
पुनामा प्रतापनगर गांव का अस्तित्व समाप्त होने के बाद वहां के लोगों के सामने अपने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को नए सिरे से व्यवस्थित करने की चुनौती थी। ऐसे समय में मंदिर की स्थापना ने लोगों को अपनी परंपराओं से जुड़े रहने का अवसर दिया। गांव के नाम पर मंदिर की स्थापना करना भी पुरानी पहचान को बचाए रखने का एक माध्यम बना।
धार्मिक स्थल समाज के लोगों को एक साथ जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पुनामा प्रतापनगर दुर्गा मंदिर भी इसी भावना का प्रतीक है। यहां की पूजा-पद्धति, ज्योत पूजा, दंड प्रणाम और अन्य धार्मिक परंपराएं विस्थापन के बावजूद लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं।
मंदिर की व्यवस्था में समाज के लोगों का योगदान
मंदिर की देखरेख और धार्मिक व्यवस्था में प्रवीण सिंह, जितेंद्र सिंह, संजय सिंह और बिजेंद्र सिंह योगदान दे रहे हैं। समाज के लोगों के सहयोग से मंदिर की धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाया जा रहा है।
पुनामा प्रतापनगर दुर्गा मंदिर की कहानी केवल एक धार्मिक स्थल की कहानी नहीं है। यह उस समाज की कहानी है, जिसने कोसी की धारा में अपना गांव खोने के बाद भी अपनी आस्था और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा। गांव की जमीन भले ही छूट गई, लेकिन मां दुर्गा के प्रति विश्वास आज भी लोगों को एक सूत्र में बांधे हुए है।
