पांच दशक से वैदिक विधि से हो रही मां दुर्गा की पूजा, रंगरा मंदिर में उमड़ते हैं श्रद्धालु

स्वप्न में मां ने दिया था मंदिर स्थापना का संकेत, 1978 से वैदिक पद्धति से हो रही पूजा

रंगरा, नवगछिया। भागलपुर जिले के रंगरा प्रखंड स्थित दुर्गा मंदिर में वर्ष 1978 से वैदिक पद्धति के अनुसार मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जा रही है। लगभग पांच दशक से चली आ रही यह धार्मिक परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ कायम है। नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तिमय माहौल रहता है और दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

स्वप्न में हुए थे मां के दर्शन

मंदिर की स्थापना से जुड़ी मान्यता के अनुसार, महानंद मिश्र को स्वप्न में मां दुर्गा के दर्शन हुए थे। मान्यता है कि देवी मां ने उन्हें इस स्थान पर पूजा-अर्चना शुरू करने और मंदिर स्थापित करने का संकेत दिया था। महानंद मिश्र ने इस अनुभव को समाज के लोगों के साथ साझा किया। इसके बाद स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर की स्थापना कर मां दुर्गा की पूजा शुरू की गई।

चार साल तक हुई कलश स्थापना, पांचवें साल स्थापित हुई प्रतिमा

मेला कमेटी के सचिव प्रभाकर ठाकुर के अनुसार, मंदिर में शुरुआती चार वर्षों तक कलश स्थापित कर मां की पूजा-अर्चना की जाती थी। इसके बाद पांचवें वर्ष मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विधिवत पूजा शुरू की गई। तभी से प्रत्येक वर्ष शारदीय नवरात्र में प्रतिमा स्थापित कर मां की आराधना करने की परंपरा चली आ रही है।

मंदिर में पूजा-अर्चना वैदिक पद्धति से कराई जाती है। पंडित आचार्य शंभूनाथ वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक विधि-विधान के साथ मां दुर्गा की पूजा संपन्न कराते हैं। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने मंदिर को क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक और आस्था के केंद्रों में स्थापित किया है।

सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होने की मान्यता

मेला अध्यक्ष एवं अधिवक्ता गौतम कुमार सिंह के अनुसार, मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। भक्तों का विश्वास है कि मां दुर्गा के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु मंदिर में चढ़ावा चढ़ाकर मां के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।

नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। महानवमी और दशमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, बलि की परंपरा और जागरण का आयोजन किया जाता है। इन अवसरों पर मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है और पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

मूर्तिकार बंटी पंडित बनाते हैं मां की प्रतिमा

मंदिर में प्रत्येक वर्ष स्थापित होने वाली मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण मूर्तिकार बंटी पंडित करते हैं। प्रतिमा स्थापना के बाद नवरात्र के दौरान श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। मेले के आयोजन से क्षेत्र में धार्मिक उत्साह का माहौल बनता है।

रंगरा दुर्गा मंदिर की पहचान केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय लोगों की आस्था और वर्षों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा से भी जुड़ा है। समय के साथ मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ी है और आसपास के क्षेत्रों के अलावा दूर-दराज से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

करीब पांच दशक से चली आ रही वैदिक पूजा पद्धति, मंदिर की स्थापना से जुड़ी मान्यता और श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास रंगरा दुर्गा मंदिर को क्षेत्र की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र बनाते हैं।

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