पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की गुरूवार को दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में निधन हो गया है. उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया था. अस्पताल के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शाम पांच बजकर पांच मिनट पर अंतिम सांस ली. उनके बारे कहा जाता है कि वो एक ऐसे जननेता थे, जिनका पार्टी के नेताओं के साथ विपक्ष के नेताओं भी लोहा मानते थे.
उनकी कैबिनेट में सबसे युवा मंत्री और वर्तमान बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहनावाज हुसैन ने उनको याद करते हुए एक लेख लिखा. वो बताते हैं कि अटल जी से मेरी पहली मुलाकात 1987 में हुई थी. तब से लेकर 30 सालों की तमाम यादें इस वक्त मेरी आंखों के सामने है. अटल जी का जाना न सिर्फ देश के लिए बल्कि मेरी निजी जिंदगी के लिए भी बहुत बड़ी क्षति है.
1987 में पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता आरिफ बेग साहब ने अटलजी से पहली मुलाकात कराई और पहली मुलाकात में ही अटलजी की आत्मीयता मुझे छू गई. लेकिन 4 दिसंबर 1997 की तारीख उससे भी ज्यादा यादगार थी. दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में एक मुस्लिम सम्मेलन था. उसमें मुझे वाजपेयीजी के सामने भाषण देने का मौका मिला. बाद में सुश्री उमा भारती जी ने बताया कि वाजपेयीजी भाषण से काफी खुश थे.

1999 में जब मैं किशनगंज से लोकसभा चुनाव जीतकर आया तो अटलजी ने अपने मंत्रिमंडल में मुझे 30 साल की उम्र में जगह दी. मुझे राज्य मंत्री बनाया और फिर 32 साल की उम्र में हिन्दुस्तान का सबसे कम उम्र का कैबिनेट मंत्री बनाया .
अटलजी ने मुझसे कहा था – रमज़ान का रोज़ा आप रखते हैं तो इफ्तार की पार्टी आप ही के यहां होगी. उसके बाद जब तक केंद्र में अटल जी की सरकार रही, इफ्तार की पार्टी मेरे यहां ही हुई और उसमें अटलजी दिल से शिरकत करते रहे.
एक बार दिल्ली के मस्जिद में कुछ लोगों से हल्की कहासुनी हो गई.. लेकिन इसे अखबार ने बढ़ा चढ़ाकर लिखा. अटलजी चिंतित हो गए, उन्होंने मुझे फोन किया. अगले दिन शनिवार को संसद में उनसे मुलाकात हुई और उन्होंने कहा – आपको संसद में बोलना है. और इसी के बाद संसद में मेरी मेडेन स्पीच हुई थी – जो अयोध्या मसले पर थी. मेडेन स्पीच पूरी होते ही मेरे पास उनकी एक पर्ची आई. मैं संसद में उनके कमरे में गया. अटलजी काफी खुश लग रहे थे, उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और गले से लगा लिया.
इतनी आत्मीयता, इतने स्नेह के बावजूद अटलजी की शख्सियत इतनी बड़ी थी कि उनके सामने जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता था इसलिए मंत्री रहने के बावजूद मैं सबकुछ हाथ पर लिख कर जाता था ताकि उनसे बात करते वक्त कुछ छूट न जाए.
14वीं लोकसभा के लिए जब मैं भागलपुर से उपचुनाव लड़ रहा था तो अटलजी ने मेरे लिए शुभकामनाओं की चिट्ठी लिखी. चुनाव जीतकर जब मैं दिल्ली में उनसे मिला तो वो ऐसे खुश हुए जैसे कोई पिता खुश होता है. उन्होंने अपने हाथों से मुझे लड्डू खिलाया.
अटलजी की एक कविता मेरे दिल के बेहद करीब है…छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता. एक महान जननायक, कवि, लेखक, वक्ता और भारत रत्न श्री अटलजी को विनम्र श्रद्धांजलि.


