जीवित्पुत्रिका या जिउतिया पर्व पर मंगलवार को महिलाओं ने व्रत रखकर फल पकवान आदि से बांस का डलिया शुभ मुहुर्त में भरा। महिलाएं सोमवार आधी रात के बाद से 24 घंटे का निर्जला उपवास पर रहीं। व्रत का पारण बुधवार को होगा। पूजन के दौरान महिलाओं ने जंगली के पत्ते पर चावल दूध और दही, चूड़ा, चीनी, खाजा का भोग लगाकर अपने-अपने पूर्वजों पितरों को याद किया और परिवार व पुत्र के सौभाग्य की मंगल कामना की। यह व्रत प्रत्येक वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को करती है। इस व्रत में महिलाएं 24 घंटे निर्जला निराहार रहकर पुत्र की लंबी आयु, आरोग्य तथा कल्याण की कामना करती है। इस बार ओटघन का समय नहीं रहने के कारण महिलाओं को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। सोमवार रात 2:30 बजे के पूर्व उन्होंने भोजन किया। बुधवार को पारण करने के बाद ही निर्जला उपवास समाप्त होगा।
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सोमवार रात ढाई बजे से पहले महिलाओं ने किया भोजन, इसके बाद शुरू हुआ 24 घंटे का व्रत, नहाय खाय के बाद की पूजा, पारण आज
दिनों से समझें व्रत की महत्ता
जितिया व्रत के पहले दिन को नहाई खाई कहा जाता है, इस दिन महिलाओं ने प्रातःकाल जल्दी जागकर पूजा पाठ किया और एक बार भोजन लिया। उसके बाद महिलाएं दिन भर कुछ भी नहीं खाती हैं। व्रत के दूसरे दिन को खुर जितिया कहा जाता है। यह जितिया व्रत का मुख्य दिन होता है। इस पूरे दिन महिलाएं जल ग्रहण नहीं करती और निर्जला उपवास रखती है। तीसरा दिन व्रत का आखिरी दिन होता है। इस दिन व्रत का पारण किया जाता है।

जिउतिया पर्व पर मंगलवार शाम में पूजन करतीं महिलाएं।
प्रदोषकाल में महिलाओं ने की जीमूतवाहन की पूजा
आश्विन माह की कृष्ण अष्टमी को प्रदोषकाल में महिलाओं ने जीमूतवाहन की पूजा की। माना जाता है जो महिलाएं जीमूतवाहन की पूरे श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा करती है उनके पुत्र को लंबी आयु व सभी सुखों की प्राप्ति होती है। पूजन के लिए जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित किया गया। साथ ही मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील व सियारिन की प्रतिमा बनाई गई। जिसकी पूजा की गई। पूजन समाप्त होने के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनी गई।
निर्जला ही जितिया व्रत का आधार

