नवगछिया – खिरनय नदी के धार्मिक महत्व की चर्चा भी इन दिनों लोगों के द्वारा की जाने लगी है. आज भले ही यह नदी अपार गंदगी के कारण अस्पृश्य हो गयी हो लेकिन जब इस नदी का आंचल स्वच्छ और धवल था तो इसी नदी के कारण यहां पर मानवीय सभ्यता का सृजन हुआ था. कई ऐतिहासिक प्रमाण हैं जो इस नदी की ऐतिहासिकता को प्रमाणिक रूप देता है.


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लोकगाथा बिहुला बिषहरी में सती बिहुला का मायका गंगा पार का उजानी गांव में बताया गया है. वर्तमान में इस नदी से उजानी गांव की दूरी महज एक किलोमीटर है. बिहुला विषहरी की लोक गाथा में सोने की नाव (स्वर्णजड़ित नाव) का भी जिक्र है. लोकगाथा को प्रमाणिक मानें तो यह कहा जा सकता है कि कभी खिरनय की ही वेगवती धाराओं पर बिहुला की नाव अटखेलियां करती होंगी. जानकार बताते हैं कि कालांतर में यह नदी सिकुड़ गयी है.

नदियों के जानकार की माने तो बहुत पहले यह नदी कोसी की मुख्य धारा थी, कालांतर में नदी जब कोसी की उपधारा बन गयी तो इसे खिरनय नाम दिया गया. वर्ष 1960 से 1970 के दशक में बांध निर्माण के कारण इस नदी का संपर्क भंग होने शुरू हो गया और 1990 के दशक में जब त्रिमुहान – कुर्सेला बांध का निर्माण पूरा हो गया तो इस नदी का कोसी से पूरी तरह संपर्क भंग हो गया.

इतिहासकारों की मानें तो एक समय ऐसा था जब खिरनय के कारण नवगछिया को लोग जानते थे. इसका कारण यह था कि खिरनय नदी इलाके का प्रमुख व्यवसायिक और यातायात का केंद्र था. इसके प्रमाण आज भी मौजूद हैं. नदी के तटों नंदलाल घाट, ठाकुरबाड़ी घाट, मील टोला घाट का नाम आज भी प्रचलित है जबकि नंदलाल घाट का जीर्ण शीर्ण सूचना बोर्ड आज भी देखा जा सकता है.

By न्यूज़ डेस्क

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