नवगछिया : नवगछिया के प्रसिद्ध संत बाबा अनंतात्मानंद ‘ बाबा स्फोटाचार्य’ ने नवरात्रि के पहले दिन नवगछिया डॉट कॉम के बातचीत के क्रम में कहा कि आराधना का केवल एक ही मार्ग है स्वयं को समर्पण करना, ईश्वर भाव के भूखे हैं. कर्मकाण्ड हेतु सप्तशती पाठ का महत्व है जो द्वैत का बोध कराती है. भक्त और भगवान , मित्र और शत्रु , माता पिता, भाई बहन आदि, यह द्वैत भाव है. जबकि तत्वतः सभी रूपों में ही केवल माँ भवानी ही है यह भाव अद्वैत है और यही अद्वैत का भाव ज्ञान की पराकाष्ठा है.
जैसे धन के लिए स्वयं का समर्पण करते हैं, जैसे प्रेमिका के लिए स्वयं का समर्पण करते हैं, जैसे पुत्रादि के लिए स्वयं का समर्पण करते हैं और उसके सुख का अनुभव प्राप्त करते हैं, वैसे ही देवी के लिए ईश्वर के लिए समर्पण करने से अलौकिक सुख का अनुभव प्राप्त हो जाता है. भगवान कृष्ण ने कहा है कि हे अर्जुन तू युद्ध भी कर और मुझ पर ध्यान भी रखा, अर्थात् जीवन के सभी कर्मों को करते हुए एक सूरत अपने कर्म पर और दूसरी सूरत ईश्वर पर हो. इससे आसान कुछ भी नहीं. इसे हमारे गाँवों की पनभरनी से उदाहरण दिया जाता है जिसका एक सूरत रास्ते पर और दूसरी सूरत सिर पर रखे घड़े पर होती है और घड़ा को बिना पकड़े ही सफर तय कर लेती है.

परन्तु यह इतना आसान है कि एक पनभरनी भी कर लेती है और इतना मुश्किल है कि बड़े से बड़े साधक भी नहीं कर पाते हैं. इस संसार में जितना भी आसान मार्ग ढूँढ़ा जाय वह और कठिन होता जाता है. संसार में मनुष्य को लगता है कि भोजन और शौच करना सबसे आसान काम है परन्तु सत्य तो यह है कि यही संसार का सबसे जटिल कार्य है. यदि मनुष्य केवल भोजन और शौच करना सीख जाय तो ईश्वर उससे दूर रह ही नहीं सकते. यह सत्य भी है और भ्रम भी। सत्य इसलिए कि जो भी इस संसार में देखते हैं वह सत्य नहीं माया ही है और इसी माया को हम सत्य मान लेते हैं यही भ्रम है. बाबा स्फोटाचार्य ने कहा कि कई लोग यह भी सोचते हैं कि देवी उनसे प्रसन्न नहीं हैं. मनोकामना पूर्ण नहीं होने का यह मतलब नहीं है कि देवी अप्रसन्न है. देवी कभी भी अप्रसन्न नहीं होती हैं. ऐसे भक्त अपने कार्य में यथावत लगे रहें. नियत समय आने पर ही सभी कार्यों की सिद्धि होती है. जबतक कोई कार्य सिद्ध नहीं हुआ है तबतक यही समझा जाय कि अभी उसका नियत समय नहीं आया है. इसलिए अपनी आस्था, विश्वास और धैर्य को बनाये रखना ही उचित है.


