बाबा अनंतात्मानंद जी महाराज उर्फ आशीषानन्द स्फोटाचार्य जी समुद्र मंथन नामक एक व्हाटशप ग्रुप चालते हैं। उस ग्रुप में बाबा लोगों के सभी प्रश्नों के उत्तर सहजता से देते हैं। नवगछिया डॉट कॉम के संपादक ऋषव मिश्रा कृष्णा ने पिछले दस दिनों में बाबा से कई तरह के प्रश्न पूछे। बिना किसी काट छाँट के पूरा साक्षात्कार आपके सामने है।
प्रश्न : क्या आगमानंद जी महाराज और आपके विचार भिन्न हैं ?
उत्तर : जो बाह्यमार्गी होता है जो विचारवान होता है उसके विचारों में भिन्नता होती है। जो अन्त: मार्गी हैं उनके विचार एक होते हैं।
जहाँ तक आगमानन्दजी का सवाल है तो यज्ञ कार्य के दौरान जब मैं उन्हें अपना पर्चा दिया था तो वे बोले थे” येकौन समझेगा आम आदमी के समझ से यह ज्ञान परे है। ” इससे ज्ञात होता है कि दोनों के आन्तरिक विचार एक हैं। जब लोग नहीं समझेगा तो मूल ज्ञान से नीचे उतरकर कार्य क्षेत्र में प्रविष्ट करना , वैसी ही विचार धारा हो जाती है जैसा कि पत्रिकाओं के TRP बढ़ाने के लिए मिर्च मशाला डालते हैं। कोई भी रिनॉल्ड पत्रिका ऐसे मशालों से परहेज करते हैं । इसी प्रकार वास्तविक संत भी TRP बढ़ाने का कोई शौक नहीं रखता। ॐ

प्रश्न : आपका कहना है कि स्वामी आगमानंद अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये प्रयत्नशील हैं ?
उत्तर : कोई अपने नहीं करता बल्कि उनके अनुयायियों द्वारा TRP बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता है।
प्रश्न : स्पष्ट करें बाबा ! अनुयायियों को कौन तुष्ट कर रहे हैं ?
उत्तर : कुछ अनुयायी अपने आप तुष्ट होते हैं तो कुछ लोभी गुरु के द्वारा।
प्रश्न : बाबा आपके सन्यासी जीवन का साध्य क्या है और इससे समाज को क्या फायदा मिलेगा ?
उत्तर : मेरे जीवन के सन्यास का साध्य है – स + न्यास । अर्थात् अपने सभी ज्ञानेन्द्रियों को न्यासित कर आत्मा में एकत्व हुए रहना।
जहाँ तक समाज का सवाल है तो प्रत्यक्ष रूप से मुझसे वही आत्मलाभ कर सकने में समर्थ होंगे जो जिज्ञासु है। तथा अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को लाभ यह मिलेगा कि इन्हें चतुर्युग से मुक्ति और दिव्ययुग की प्राप्ति होगी। ॐ
प्रश्न : आपने अपने साहित्य में कई जगहों पर दिव्ययुग की चर्चा की है। दिव्ययुग क्या है बाबा ? यह कब तक आयेगा?
उत्तर : दिव्ययुग है –
“न होगी गरीबी बीमारी, अलौकिक होंगे नर व नारी।
प्रेम लीला ही जग में होगा, न होगी कोई तैयारी।।
और इसके लिए मैं प्रयास रत हूँ और यही मेरे जीवन का उद्देश्य है। जहाँ तक निर्धारित समय की बात है तो यही कह सकता हूँ कि जब ज्यादा से ज्यादा लोग स्वयं को जान जाय तब मैं समय निर्धारित कर सकता हूँ।
और यदि अभी तक जो हुआ है कि लोग नहीं जान पाते क्योंकि जरूरत नहीं समझने के कारण प्रयास नहीं करते। यदि ऐसा ही रहा तो मैं अकेले ही ईश्वर से प्रार्थना और प्रेम की लड़ाई तबतक लड़ता रहूँगा जब यह सृष्टि लय होकर पुन: प्रकटीकरण की अवस्था में होगी। तभी यह संभव हो सकता है।
प्रश्न : क्या दिव्य युग को पहले किसी ने देखा है ! किसी ने सुना है ! क्या दिव्ययुग के बारे में कहीं लिखा है ?
उत्तर : हमारी चेतना जब दिव्यता का आभास करने लगती है तो हम कह सकते हैं कि हमने देखा है। परन्तु जो अनुभव होता है उसका प्रमाण नहीं होता। ऐसे दिव्य शब्द हमारे सनातन ज्ञान में तो लिखा ही है । पर यदि मैं यह कहूँ कि वेद (ज्ञान) को जिसने जाना , उसका क्या प्रमाण है तो वैदिक ऋषि प्रमाण न दे पाते बल्कि उदाहरण देकर, तर्क देकर समझाते थे। क्योंकि यह वेद (ज्ञान) उनका अनुभव है जो अन्त: करण में व्यक्त हुई। ॐ न होगी गरीबी ………..
से कल्पना करने का प्रयत्न करें कि यदि ऐसा होगा तो वह समय कैसा होगा। संभव है दिव्यता का आभास प्राप्त हो जाय । ॐ सर्वभवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः। …….
खरबों वर्षों से तोते की तरह रटते रहे हैं और प्रकृति जैसा है उसको स्वीकार भी कर लेते हैं तो कैसे संभव है कि उपर्युक्त संदर्भ सिद्ध हो जाए। इस हेतु प्रकृति का परिवर्तन आवश्यक है।प्रकृति के नियमों में परिवर्तन आवश्यक है। जो किसी भी ऋषि के बस की बात नहीं। ईश्वर द्वारा ही हम करा सकते हैं। परन्तु अभी तक ऐसा प्रयास प्रकृति को छोड़कर “हम सुधरेंगे जग सुधरेगा” पर ही आश्रित है। और यह सृष्टि जबतक गलत पैदा करते रहेगी तबतक यह संभव नहीं। अत: निष्कर्ष यही होता है कि सृष्टि के नियमों में परिवर्तन कराना ही एक मात्र विकल्प है। ॐ गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है कि इस सृष्टि का प्रटीकरण ईश्वर और माया के संवाद विवाद में हुआ है। तो मेरा ईश्वर से यही लड़ाई यही प्रार्थना है कि ईश्वर और माया अपना विवाद समाप्त कर केवल संवाद में सृष्टि का प्रकटीकरण करें। जो दिव्ययुग ही होगा। ॐ
प्रश्न : आपके नजर में हत्या करना किस तरह के कर्म में आता है ?
उत्तर : हत्या विकर्म है। विकर्म उसे कहते हैं जो शास्त्रोक्त नहीं हो।
कर्म – सामान्य है जिसका प्रारब्ध बनता है।
अकर्म – शास्त्रोक्त है जिसका फल नहीं बनता।
विकर्म – शास्त्र के विरूद्ध कर्म है। ॐ
प्रश्न : कृप्या विस्तारित करें बाबा !
उत्तर : कर्म की गति बड़ा ही गहन है।
कर्म – सामान्य व्यक्ति जो कर्म करता है उसे उसका फल भोगना पड़ता है। उसका जैसा कर्म होता है वैसा ही फल भोगना पड़ता है। यहाँ गति का तीसरा नियम लागू होता है। “प्रत्येक दिशा के विपरीत तथा प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है। ”
अकर्म – अकर्म वह है जो हम बाहर से करते हैं और जो अन्दर से करते हैं। हम बाहर से दैनिक कार्यों में रहते हुए यदि अंदर से ईश्वर में हो तो बाहर का कर्म नहीं बनता। इसी को गीता ने कर्म में अकर्म कहा है। इसका फल नहीं बनता।
विकर्म – वह है जो नैतिकता अथवा मानवीयता को छोड़कर निज स्वार्थ हेतु अकारण ही दूसरों को कष्ट देता है। इसका परिणाम अत्यंत दुखदायी होता है। ॐ
प्रश्न : हत्या है क्या ? मानव एसे विकर्म करता क्यों है ? हत्या का परिणाम क्या होता है ?
उत्तर : हत्या जघन्य पाप है। हत्या मानव मन की संकीर्णता और वासनात्मक स्वार्थ का परिणाम है। हत्या का परिणाम हत्या ही है। ॐ

