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भाजपाई गौबेल्स के इतने बड़े भक्त हैं कि उसकी कही हर बात को ब्रह्मवाक्य मान, पूरी निष्ठा से उसका अनुकरण करते हैं। भाजपा के डीएनए में, आचरण में, व्यवहार में, नियति में, कण-कण में दोहरापन समाया हुआ है। अपने वादों और नारों की कलई ये स्वयं खोलते है। गौबेल्स की भाँति भाजपा का मानना है कि प्रोपगेंडा, झूठ को सच बता निरन्तर दोहराने, चोरी कर सीनाजोरी करने से अपने हर दोष को छुपाया जा सकता है, हर झूठ को सच साबित किया जा सकता है और ऐसे अनुयायियों की उग्र सेना खड़ी की जा सकती है जो बिना सवाल किए हर बात में हाँ में हाँ मिलाने के लिए प्रोग्राम्ड हो जाते हैं।

वैसे तो भ्रष्टाचार, सामाजिक सद्भाव, विकास आधारित राजनीति, राजनीति में सदाचार, वंशवाद इत्यादि हर विषय पर भाजपा के दोहरे रवैये से भरे आचरण के उदाहरण से सभी भली भाँति परिचित हैं। पर मैं आज भाजपा के परिवारवाद अथवा वंशवाद के मुद्दे पर दोमुँही राजनीति को रेखांकित करना चाहूँगा। जब भाजपा ने हमें वंशवाद पर घेरना चाहा तो मैंने भी उन्हें कड़े शब्दों में दो टूक कह दिया था कि आप शपथ पत्र दे दें कि आप किसी भी नेता के किसी भी सम्बन्धी को पार्टी में, किसी भी हैसियत में शामिल नहीं करेंगे तो मैं भी राजनीति छोड़ दूँगा। भाजपा नेताओं ने मेरी चुनौती को ना तो स्वीकार किया और ना ही सीधे तौर पर उन्हें मेरी बात पर जवाब देते बना। तो लगे इधर उधर की हाँकने और बात छीलने!जब इनसे तथ्यों के आधार पर बात की जाए तो अनाप शनाप दलील देने लगते हैं। मैंने उन्हें बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान यह चुनौती दी थी। आज तक जवाब नहीं आया। उस वक़्त परिवारवाद के मुद्दे पर उछलकूद करने वाले भाजपाई उस खुली चुनौती के बाद ऐसे बिल में छिपे कि आजतक बाहर नहीं निकले है।

अब 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव भी आ गए। पर भाजपा में वंशवाद का मुद्दा आज भी जस का तस बना है। पर इसके बावजूद भी ये दूसरे पर अँगुली उठाने से बाज नहीं आ रहे हैं। आलम यह है कि ऐसे लगभग सैंकड़ो भाजपा नेता हैं जो अपने बच्चों को टिकट दिलवाने के होड़ में लगे हैं।

दूसरों पर परिवारवाद का आरोप लगाने वालों को ना तो परिवार आधारित पार्टी जैसे शिव सेना, लोक जनशक्ति पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, पीडीपी इत्यादि से चुनावी गठबंधन से कोई परहेज़ है और ना ही अपने ही दल में पनप रहे परिवार केंद्रित महत्वाकांक्षा से कोई तकलीफ़ है। दोहरे चाल, चरित्र और चेहरे वाली पार्टी बीजेपी अपने पल्लू में नहीं झाँकती जिसमें अनगिनत परिवार जैसे सिंधिया परिवार, कल्याण परिवार, राजनाथ परिवार, बहुगुणा परिवार, आर्य परिवार, मुंडे परिवार, महाजन परिवार, धूमल परिवार, वर्मा परिवार, गोयल परिवार, मिश्र परिवार, टण्डन परिवार, रमन परिवार, येदुर्रप्पा परिवार, बेल्लारी परिवार, जसवंत परिवार, सिन्हा परिवार, ठाकुर परिवार, चौबे परिवार इत्यादि अनेकों अनेक परिवार नहीं दीखते है। इनका संकीर्ण लक्ष्य तो बस दूसरों के जनसमर्थन को देखकर, किसी भी विषय पर विवाद खड़ा कर हंगामा करना और कराना होता है। ताकि मूल मुद्दों से ध्यान भटकाया जा सके।

इस देश में सबसे ज्यादा परिवारवाद को बढ़ावा देने वाला परिवार तो भाजपा का जन्मदाता “आरएसएस” परिवार है। इस परिवार मात्र जुड़ने से भाजपा के लिए कोई भी व्यक्ति या उम्मीदवार तुरन्त योग्य, कर्मठ, देशप्रेमी और अनुभवी कहलाने लगता है। संघ परिवार वह विषैला वृक्ष है जिससे आने वाला हर फल समाज और देश के सद्भाव के लिए विषैला ही होता है। ये लोगों को उनके कर्म से नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर आँकते हैं। ये वही लोग हैं जो सदियों से अन्यायपूर्ण गैर-बराबरी की व्यवस्था के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं। वर्ण व्यवस्था को बढ़ावा देकर इन लोगों जैसी मानसिकता वालों ने सदियों से यह सुनिश्चित किया कि अवसरों, संसाधन और उच्च पदों पर मुठ्ठीभर लोगों का एकाधिकार बना रहे। यह विषैला परिवार युवा पीढ़ी की खुली सोच को संकीर्ण और साम्प्रदायिक बनाने का निरन्तर षड्यंत्र रच रहा है। वैश्विक विश्व में अगर भारत को आगे बढ़ना है तो यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारतीय युवाओं की सोच व्यापक और सभी के साथ भिन्नता को आदरपूर्वक स्वीकार करके आगे बढ़ने वाला हो, ना कि संकीर्ण बनकर अपने ही देश को लोगों में सांस्कृतिक और धार्मिक भिन्नता के आधार पर भेद करने वाला हो। और तभी हमारा युवा देश की पैठ पूरे विश्व में जमाने में मददगार साबित हो सकता है।

राजनीति में किसी के किसी राजनीतिक परिवार से होने से भले प्रारम्भिक लाभ मिल सकता है। पर अपने काम और काबिलियत से लोगों के हृदय में स्थान बनाने की पहल स्वयं ही करनी पड़ती है। अगर उनकी पार्टी या परिवार बार-बार उन्हें जनता के सम्मुख रख भी दें, तो भी उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार जनता जनार्दन के पास ही रहता है। यह राजशाही नहीं जो अयोग्य वारिस भी स्वयं को जनता पर थोप सकता हो। मतदाता का मत जिसके पास हो, वही देश के नागरिकों की सेवा करने का अधिकार पाता है, और वह भी सीमित समय के लिए। अतः परिवारवाद का मुद्दा किसी भी लोकतंत्र के लिए बेमानी है, क्योंकि इसे बढ़ावा देने या नकारने का अधिकार अंत में जनता के हाथ में ही होता है। इसे मुद्दा वही बनाते हैं जिनके पास जनता के हक़ में बोलने के लिए बहुत कुछ नहीं होता है।

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By Rishav Mishra Krishna

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