खरीक (नवगछिया)। घनी आबादी के बीच स्थित ध्रुवगंज का बुढ़िया दुर्गा मंदिर, जिसे पुरानी दुर्गा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, अपनी प्राचीन परंपराओं, ऐतिहासिक मान्यताओं और लोगों की गहरी आस्था के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास 500 साल से भी अधिक पुराना है। मंदिर की उत्पत्ति से जुड़ी एक रोचक लोककथा आज भी ग्रामीणों के बीच प्रचलित है।
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गंगा नदी से जुड़ी है मंदिर की स्थापना की लोककथा
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, ग्रामीण सिताबी शर्मा के पूर्वज रोजाना मजदूरी करने के लिए नाव से गंगा नदी पार करके जाया करते थे। उस समय गंगा नदी वर्तमान कलबलिया धार के आसपास बहती थी। एक दिन वे मजदूरी के लिए घर से निकले, लेकिन वापस नहीं लौटे। काफी समय तक उनका पता नहीं चलने पर परिजनों ने किसी अनहोनी की आशंका में उनके अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी।

लोकमान्यता के अनुसार, घटना के सातवें दिन वे अचानक ग्रामीणों को दिखाई दिए। जब लोगों ने उन्हें घर लौटने के लिए कहा, तो उन्होंने इनकार करते हुए गांव में शांति और समृद्धि के लिए माता की प्रतिमा स्थापित करने की बात कही। इसके बाद उनके आवास पर माता की प्रतिमा स्थापित की गई। समय के साथ यहां मंदिर का निर्माण हुआ और यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
विसर्जन के अगले दिन लगता है माता के चढ़ावे का डाक
ध्रुवगंज के बुढ़िया दुर्गा मंदिर की पूजा परंपरा भी खास मानी जाती है। मेला कमेटी के सदस्य कुणाल कुमार नटवर, उपसरपंच ललन कुंवर, सूरज कुमार, संजय शर्मा, बालमुकुंद शर्मा, अर्जुन कुंवर, गुलजारी शर्मा, विकास शर्मा, निर्मल कुमार, अभिनय कुमार, कारे शर्मा, वरुण कुमार और मनीष कुमार के अनुसार, प्रतिमा विसर्जन के अगले दिन शाम को मंदिर परिसर में माता को चढ़ाई गई चुनरी, साड़ी, जनेऊ, चूड़ी और बिंदी जैसी वस्तुओं का डाक लगाया जाता है।
स्थानीय मान्यता है कि इस डाक में खरीदारी करने वाले श्रद्धालुओं पर माता की विशेष कृपा बनी रहती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी परंपरा के कारण विसर्जन के अगले दिन भी मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की गतिविधियां बनी रहती हैं।
निःसंतान महिलाओं के खोइंछा चढ़ाने की विशेष मान्यता
मंदिर की सबसे प्रमुख मान्यताओं में निःसंतान महिलाओं की मनोकामना से जुड़ी परंपरा शामिल है। स्थानीय लोगों के अनुसार, संतान प्राप्ति की कामना करने वाली महिलाएं माता के दरबार में पहुंचकर खोइंछा चढ़ाती हैं और संतान सुख की प्रार्थना करती हैं। इसे लेकर क्षेत्र के श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है।
इसी मान्यता के कारण शारदीय नवरात्र की अष्टमी के दिन मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त माता दुर्गा की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।
आस्था, परंपरा और लोकसंस्कृति का केंद्र
ध्रुवगंज का बुढ़िया दुर्गा मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि स्थानीय लोकसंस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं का भी प्रतीक है। मंदिर से जुड़ी लोककथाएं, चढ़ावे के डाक की परंपरा और खोइंछा चढ़ाने की मान्यता इसे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं। आज भी ग्रामीणों के लिए यह मंदिर श्रद्धा, विश्वास और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
