इस महीने के 14 तारीख को एक फिल्म आ रही है नाम है मुकद्दरपुर का मंजनू जिसे निर्देशित किया है बिहार की राजधानी पटना के रहने वाले रविकांत सिन्हा. रविकांत सिन्हा ने इस फिल्म को निर्देशित करने से पहले कई सीरियल और फिल्मों में भी काम कर चुके हैं.

बतौर निर्देशक रविकांत की यह पहली फिल्म है. इससे पहले वो कास्ट डायरेक्टर के रूप में कई फिल्मों और सीरियल में काम कर चुके हैं.

रविकांत सिन्हा ने डीबीएन से खास बातचीत में बताया कि उनके परिवार वाले और शिक्षक उनको सीए के रूप में देखना चाहते थे लेकिन मेरा लगाव कला की तरफ था यहीं कारण रहा कि कई बार घरवालों के साथ-साथ लोगों के ताने सुनने पड़े. लोग कहते यह लड़का नचनिया गवनिया बनेगा लेकिन मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. थियेटर करने के लिए घर-घर जाकर टिकट बेचना अपने ही मोहल्ले में पोस्टर चिपकाना ये सारी चीजे चलती रही. मुझे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला लेने का मन था लेकिन किस्मत ने मुझे भारतेंदु नाट्य अकादमी लखनऊ पहुंचा दिया.

भारतेंदु नाट्य अकादमी लखनऊ जहां सीमित संसाधन में इतना अच्छा पढाई हमने कभी सोचा नहीं था. हमारे टीचर परिवार के सदस्यों से कहा करते थे यह लड़का कुछ अच्छा जरुर करेगा. इस दौरान रॉबिन दास, देवेंद्र राज अंकुर, पीयूष मिश्रा, सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ, नसरुद्दीन शाह, विजय राज जैसे रंगमंच के मंझे हुए कलाकारों से मिलने का मौका मिला जिससे मिझे लगा कि कुछ तो अलग है. इनलोगों के बातें अनुभव से बहुत कुछ सीखने को मिला. सच कहूं, तो मुझे पता ही नहीं था कि इस फिल्म के क्षेत्र में मै आऊंगा.

मेरा एक सपना था कि मै सिर्फ थियेटर करूंगा अपने गांव, शहर जाकर इसको निरंतर जारी रखूंगा लेकिन चीजे अपने आप ही होती चली जाती है. बातचीत के दौरान रविकांत सिन्हा को इस बात का दुःख भी हुआ कि आज का रंगमच सरकारीकरण की तरफ हो चला है और अनुदान ने इसको अपने पथ से भटका दिया है. नित्य नए-नए संस्थाएं खुलती है और सरकार के अनुदान पर चलती रहती हैं. पहले जितना प्रतिस्पर्धा एकदूसरे के बीच होता था अब नहीं देखने को मिलता है. एफटीआई पुणे में एफए कोर्स कम्प्लीट होने बाद मुझे फिर से बीएनए से बुलावा आ गया सीफा को लेकर. सीफा नाटक जिसे हमने पुरे देश में किया है फिर से इसको करने के लिए त्रिपुरारी मैम के साथ मौका मिला.

थियेटर करने के दौरान आर्थिक तंगी का भी सामना करना पड़ता है तो कोई कितने दिनों तक इसको करता रहेगा. हालांकि सीफा के अलावे पटना में सिटी इप्टा के साथ डॉक्टर किलकीरी के साथ बेबी डॉल में भी अभी कुछ दिन पहले ही काम किया है. साल 2011 में पहली बार मुंबई आया था दोस्त लोग इतने अच्छे हैं कि कुछ कहना नहीं उन्होंने मुझे बहुत सपोर्ट किया है. हालांकि दो तीन बार यहां आना जाना भी हुआ लेकिन दोस्त लोगों के वजह से ही यहां टीक पाया हूं.

एक दुबला पतला इंसान होते हुए भी मैं हर तरह के रोल को बखूबी अंजाम दिया है. मुंबई में काफी संघर्ष करना पड़ा लेकिन कभी इससे पीछे नहीं हटा. मुंबई में आकर एक दिन में छह, सात ऑडिशन दिया करता था. मेरी शुरुआत कास्टिंग डायरेक्टर के रूप में उतरण सीरियल से हुई. “सावित्री” लाइफ ओके पर, दुर्गा द चैम्पियन, मराठी उतरण और सबसे बड़ा मौका मुझे सुभाष घई जी की महत्वकांक्षी फिल्म “कांची” में भी काम किया. इस फिल्म में जुड़ने का मौका मयंक दीक्षित के कारण मिल पाया.

इसके बाद काम लगातार मिलता गया इसके बाद धीरे-धीरे ऐड फिल्मे भी मिलनी शुरू हो गई. जिसके बाद मजा दोगुना हो गया. फिल्मों में काम करने से कुछ अलग करने का मौका भी मिलना शुरू हो गया. मधुर भंडारकर की फिल्म “हीरोइन” में भी काम किया. इस दौरान “इश्क मलंग” करने के लिए बनारस पहुंचा जिसमे कुछ ढूंढ रहा था. नाटक हनु हटेला से लड़की छ्टकी के संवाद से नाटक के रूप में रूपांतरित करवा दिया जो बाद में फिल्म के रूप में परिवर्तित हो गया.

इश्क मलंग जिसकी कास्टिंग मैंने किया था, शूट के दौरान पंकज त्रिपाठी, राजेश शर्मा, राहुल बग्गा ने इस नाटक को सुन फिल्म के रूप में बनाने के लिए कहा जिसे शेखर रमेश मिश्रा ने इसको लिखा. इस रोल के लिए नवाजुदीन सिद्दीकी जी को लेने के लिए बात चली जो बीएई में हमारे सीनियर रहे हैं. हालांकि राहुल बग्गा जी ने इस फिल्म में मुख्य भूमिका अदा की है. अगर यह फिल्म आज मैने बनाने में सफलता हासिल की है तो उसमे राहुल बग्गा और अरुण मित्रा का बहुत बड़ा हाथ है अगर इनदोनो का साथ मुझे नहीं मिलता तो शायद यह मुमकिन नहीं था.

रविकांत सिन्हा ने बातचीत में कहा कि मुझे इस फिल्म के दौरान रूम के किराये देने के लिए मेरी बाइक तक बीक गई. इस बात का दुःख नहीं है कि मुझे की बाइक तक बीक गई. इस बात से संतुष्ट हूं मेरी मेहनत रंग लाई है अप्रैल 14 को यह फिल्म सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने जा रही है. आप सिनामघरों में जाकर इसको देख सकते हैं.

रविकांत सिन्हा के निर्देशन में बनी इस फिल्म का स्क्रीनप्ले और संवाद शेखर रमेश मिश्रा ने लिखा है. सिद्धांत शर्मा, आनंद मेनन तथा सुमीत बेल्लारे ने मधुर संगीत दिया है. कास्टिंग डायरेक्टर अरोन मित्रा, एसोसिएटेड ड्रीम्स फिल्म प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले बनी इस फिल्म को पद्मिनी अरुण सिंह ने प्रोड्यूस किया है. इस फिल्म में राहुल बग्गा, साहिल अंसारी, अरुण मित्रा, तरुण खन्ना, अंश सिंह, जुगल किशोर, तान्या सिंह, नवल किशोर अर्श गोस्वामी, विधि पारीख ने अहम् भूमिका निभाई है. इस फिल्म की पुरी शूटिंग शाहजहांपुर और लखनऊ में किया गया है. रविकांत सिन्हा खुद को इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे रंगमंच की अहम् भूमिका मानते हैं, उनका कहना है कि इस सफलता के पीछे उनके गुरु धनंजय सिन्हा जी का बड़ा हाथ है उन्ही के बदौलत आज मुकाम पर पहुंच पाया हूं

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By न्यूज़ डेस्क

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