नवगछिया : कुमार स्मृति, कार्बाइड के नुकसान को देखते हुए नवगछिया सहित आसपास में अब इथीलीन से केला पकाया जाएगा। इसके लिए गोपालपुर के मालपुर की रहने वाली सरिता देवी ने एक अभियान चलाया है। इस अभियान का उद्देश्य क्षेत्र को कार्बाइड मुक्त करना है, ताकि लोग इसके दुष्प्रभाव से बच सकें।

सरिता देवी ने पहले कृषि विज्ञान केन्द्र सबौर में इथीलीन से केला पकाने के गुर सीखे। उन्हें यह बताया गया कि कार्बाइड से केला पकाना जितना नुकसानदायक है, इथीलीन से उतना ही सुरक्षित है। सिर्फ यही नहीं, यह कम खर्चीला भी है। इसके बाद से सरिता देवी ने कार्बाइड से केला पकाना बिल्कुल बंद कर दिया।

महिलाओं को कर रहीं जागरूक

सरिता देवी इलाके की अन्य महिला किसान को इथीलीन से केला पकाने के लिए जागरूक करने लगीं। अब महिलाएं इथीलीन से ही केला पकाकर बाजार में बेच रही हैं। सरिता देवी ने बताया कि उनके पास भी दो एकड़ खेत है, जिसमें केले की खेती होती है। उन्होंने कहा कि अब यह अभियान नवगछिया, गोपालपुर सहित आसपास के अन्य जगहों पर भी चलाया जाएगा।

इथीलीन से पकाने के फायदे

इथीलीन से केला पकाने के कई फायदे हैं। इससे पका केला नुकसानदायक नहीं होता है। इतना ही नहीं, इस तरह पके केला में ज्यादा मिठास होती है। कार्बाइड से पका केला हरा ही रह जाता है, जबकि इथीलीन से पके केले का रंग पीला हो जाता है। जो काफी सुंदर दिखता है। खास बात यह है कि कार्बाइड से पका केला जल्द ही टूट जाता है, जबकि इथीलीन से पकाया हुआ केला जल्द नहीं टूटता है। इस कारण केला व्यापारियों को इसकी अच्छी कीमत मिल जाती है।

कैसे पकाते हैं केला

बीएयू के वैज्ञानिक डॉ. फिजा अहमद ने बताया कि कार्बाइड से बहुतायत में केला पकाया जाता है। केला पकाने में इसकी काफी मात्रा डाली जाती है। इससे नुकसानदायक अंश केला के भीतर भी चला जाता है। वहीं इथीलीन की काफी कम मात्रा से ही केला पक जाता है। जो नुकसानदायक नहीं है। उन्होंने बताया कि एक लीटर पानी में मात्र आधा मिलीलीटर इथीलीन की दर से घोल तैयार किया जाता है। एक ड्रम में इस तरह का घोल तैयार कर उसमें कच्चा केला या उसकी खानी को डुबाकर निकाल लिया जाता है। इसके बाद उसे कपड़े से ढककर कमरे में रख दिया जाता है। इससे केला 24 से 48 घंटे में पक जाएगा।

डॉ. फिजा अहमद ने बताया कि इथीलीन हर पौधे में पाया जाने वाला तत्व है, लेकिन इसे विभिन्न कंपनियां व्यावसायिक रूप से तैयार करती हैं। बाजर में यह इथीलीन इथरील व इथोफान नामों से बिकता है। यह कार्बाइड से सस्ता भी पड़ता है।

सबौर स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र की वैज्ञानिक डॉ. अनिता ने बताया कि सरिता देवी को प्रशिक्षण दिया गया और शुरू में प्रोत्साहित करने के लिए दो सीसी एथरील भी दिया गया। अब यह प्रशिक्षण जागरूकता के रूप में फैल रहा है।

📲 Naugachia News WhatsApp Group Join करें
Join Now →

By न्यूज़ डेस्क

न्यूज़ को शेयर करे और कमेंट कर अपनी राय दे.....

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *