सात जन्मों के बंधन को विवाह कहा गया है। शादी में विवाहित जोड़े सात वचन लेकर एक-दूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते हैं, लेकिन पटना की युवती सुगंधा मुंसी ने शादी में सात वचन के बदले संविधान की प्रस्तावना में वर्णित शब्दों के साथ समानता, नैतिकता और अभिव्यक्ति की आजादी की शपथ ली है।

बिहार की राजधानी पटना स्थित अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान में जेंडर विशेषज्ञ सुगंधा ने 17 जून को मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा के गिरीश महाले के साथ शादी की है। शादी मप्र की पंचमढ़ी में हुई। गिरीश ने आईआईटी खड़गपुर से पढ़ाई की है और आईबीएम की नौकरी छोड़ शिक्षा वैज्ञानिक के रूप में काम कर रहे हैं।

न कन्यादान हुआ और न ही विदाई

शादी पहले मराठी तथा बाद में बिहारी रीति-रिवाज से हुई। मगर न तो कन्यादान हुआ और न विदाई हुई। विदाई के बदले दोनों परिवारों के बीच मिलन समारोह हुआ। गिफ्ट के तौर पर बच्चों ने राष्ट्रीय ध्वज और बुजुर्गों ने संविधान की उद्देशिका उपहार स्वरूप भेंट की।

सुगंधा बोली, समाज का बदलाव जीवन में उतारना चाहिए
सुगंधा बताती है कि आप समाज में जो बदलाव देखना चाहते हैं, उसे अपने जीवन में उतारना चाहिए। यही उन्होंने किया भी। ऐसा माना जाता है कि विवाह दो लोगों का मिलन होता है। इसके लिए समाज ने शादी को एक इकाई माना है। यह सिर्फ परिवार के लिए नहीं है, बल्कि अपने राज्य, देश और समाज के लिए बंधन है।

हम भारत के लोग…

सुगंधा और गिरीश ने विवाह के दौरान संविधान की प्रस्तावना, हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने की कसमें खाईं।

आश्चर्यचकित हुए परिवार

कंकड़बाग निवासी आशा रानी और जवाहर लाल मुंसी की पुत्री सुगंधा की गिरीश से पहली मुलाकात एक कार्यक्रम में हुई। दोनों ने शादी का मन बना लिया। जब दोनों ने संविधान की प्रस्तावना के साथ शादी करने की बात रखी तो माता-पिता आश्चर्यचकित रह गए, लेकिन उन्हें समझाने में अधिक समय नहीं लगा।

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By न्यूज़ डेस्क

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