बिहार के तिरहुत प्रमंडल में पांच साल बाद एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) यानी चमकी बुखार का प्रेत फिर से जाग उठा है। बीते एक पखवाडे़ में इससे सवा सौ से अधिक बच्चों की सांसें थम चुकी हैं। करीब चार सौ बच्चे अस्पतालों में भर्ती कराए गए। मरीजों का आना अब भी जारी है। हर रोज बच्चों की जान जा रही है। इस इलाके के बच्चों और उनके अभिभावकों की आस प्रकृति पर टिकी है। तापमान गिरने से पहले इसके कहर को रोक पाना मुमकिन नजर नहीं आ रहा। .

बिहार में इस वर्ष तापमान पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ रहा है। प्रचंड गरमी के कारण लू से दक्षिण बिहार में पिछले चार दिनों में दो सौ से अधिक मौतें हो चुकी हैं। प्रशासन ने कई शहरों में दोपहर में आवाजाही कम करने के लिए निषेधाज्ञा तक लागू कर दी। हालांकि विरोध होने पर इस आदेश को वापस ले लिया गया। तिरहुत प्रमंडल में चमकी बुखार के तांडव की भी वजह प्रचंड गरमी बताई जा रही है। लेकिन निचले स्तर पर स्वास्थ्य महकमे की शिथिलता भी इतनी बड़ी संख्या में मौतों के लिए जिम्मेदार है।

लोकसभा चुनाव की व्यस्तता में इस बार इस महामारी से निपटने की तैयारियां पीछे छूट गईं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उपकेंद्रों पर यदि तैयारी रहती, तो यकीनन मौतों का आंकड़ा कम हो सकता था। वैसे राज्य के मुख्य सचिव दीपक कुमार का दावा है कि बेहतर उपचार व्यवस्था के कारण इस साल चमकी बुखार से मौतों का औसत कम है। इस बार पीड़ित बच्चों में से 26 फीसदी की मौत हुई है, जबकि पिछले वर्षों में यह दर 35-36 फीसदी तक रहती थी।

चमकी बुखार का शिकार ज्यादातर गरीब परिवारों के कुपोषित एक से 15 साल तक के बच्चे ही होते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि गंदगी, भूख और खाली पेट लीची खाने से इस महामारी को पांव पसारने का ज्यादा मौका मिलता है। इस महामारी ने तीन दशक पहले बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में दस्तक दी थी। 1994 में पहली बार इसने कहर बरपाया था। लेकिन इतना लंबा समय गुजर जाने के बाद भी चिकित्सा विज्ञान इस बुखार का कारण पता नहीं कर पाया है। इसका वायरस आज भी अज्ञात है।

जाहिर है, ऐसी परिस्थिति में जो भी इलाज हो रहा है, वह अनुमान और अनुभव के आधार पर हो रहा है। समय-समय पर शोध संस्थान स्थापित करके इसके वायरस का पता लगाने की आवश्यकता महसूस की गई, पर गंभीर पहल का अभाव रहा। इस बार हालात का जायजा लेने और चमकी बुखार की भयावहता देखने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्द्धन ने मुजफ्फरपुर में शोध संस्थान स्थापित करने की घोषणा की है। वैसे एक धारणा है कि लीची उत्पादन वाले इलाकों में इस बीमारी का प्रकोप सामने आता है।

लीची की पैदावार आने और पारा चढ़ने के साथ प्रकोप बढ़ता जाता है। पर इस धारणा को भी चमकी बुखार ने झुठला दिया है, क्योंकि इसका तांडव वैसे इलाकों में भी सामने आ रहा है, जहां लीची का उत्पादन नगण्य है। इस साल सीतामढ़ी, पूर्वी चंपारण और वैशाली जिलों से भी बच्चों के इस रोग की चपेट में आने की शिकायतें आ रही हैं। फिर सवाल यह भी है कि देश के अन्य हिस्सों में, जहां लीची पैदा होती है, वहां यह बुखार क्यों नहीं होता? .

वर्ष 1994 के बाद राज्य सरकार ने पोलियो उन्मूलन की तर्ज पर इससे निपटने की रणनीति बनाई थी। तब यह तय हुआ था कि सरकार गरीब अभिभावकों से यह अपेक्षा नहीं करेगी कि वे पीड़ित बच्चे को तत्काल अस्पताल पहुंचाएं, बल्कि सरकार अपने साधन-संसाधन का इस्तेमाल करके ऐसा सुनिश्चित करेगी। इसके लिए अस्पतालों में एंबुलेन्स सेवा शुरू की गई। आशा कार्यकर्ताओं से लेकर पंचायतों के वार्ड सदस्यों तक को इस अभियान से जोड़ा गया। लोगों को जागरूक करने के लिए गांवों में परचे बंटवाए गए।

इसका नतीजा यह रहा कि साल 2015 से 2018 तक बच्चों के बीमार पड़ने और पीड़ितों की मौत का ग्राफ काफी नीचे आ गया। 2015 में 75 बच्चे बीमार पड़े और 11 की जान गई। 2016-17 में क्रमश: 30 और नौ बच्चे इसकी जद में आए और जान का नुकसान भी काफी कम हो गया। पिछले साल 35 बच्चे इससे पीड़ित हुए और 11 की मौत हुई। लेकिन इस बार चमकी बुखार ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। 18 जून तक 381 बच्चे बीमार पड़े और इसने 135 की जान ले ली। .

चमकी बुखार का तांडव अधिक गरमी में सामने आता है और समस्या यह है कि अब हर साल गरमी बढ़ रही है। तिरहुत प्रमंडल तीन बड़ी नदियों- गंगा, गंडक और बागमती से प्रभावित है। बावजूद इसके इस इलाके में नमी में कमी आ रही है। ताल-तलैयों के सूखते जाने का भी असर है। वेल्लोर के वायरोलॉजी विशेषज्ञ टी जैकब जॉन ने चमकी बुखार के बारे में अध्ययन किया था।

उनका निष्कर्ष था कि कुपोषण और गंदगी इसकी सबसे बड़ी वजहें हैं। पारा चढ़ने के साथ लीची की पैदावार आती है। वैसे बच्चे, जिन्हें अपने घर में भरपेट खाना नहीं मिलता, वे लीची के बगीचों के ईद-गिर्द मंडराते रहते हैं। पेट की ज्वाला बुझाने के लिए वे लीची खाते हैं। जैकब जॉन का सुझाव था कि बच्चे खाली पेट न सोएं और सुबह खाली पेट लीची न खाएं। बुखार आने पर उन्हें तत्काल पास के अस्पताल में ले जाया जाए और एक से दूसरे अस्पताल तक कोल्ड चेन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। तभी पीड़ित बच्चे बचाए जा सकते हैं। .

जाहिर है, यह मामला सिर्फ रोग और गरमी का नहीं, लोगों की आर्थिक स्थिति का भी है। इसका वायरस से ज्यादा बड़ा कारण गरीबी है। अब राज्य सरकार ने पीड़ित बच्चों के परिवारों का आर्थिक-सामाजिक सर्वे कराने और कुपोषण का अध्ययन कराने का फैसला किया है। लेकिन बड़ी चुनौती लोगों को इस आर्थिक स्थिति से बाहर निकालने की होगी। साथ ही केंद्र और राज्य सरकार को स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में निचले स्तर से मेडिकल कॉलेज तक न केवल आधारभूत संरचना दुरुस्त करनी होगी, बल्कि डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और एंबुलेन्स की अपेक्षित तैनाती भी सुनिश्चित करनी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त, बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक शोध की भी जरूरत है, तभी मासूम बच्चों को बचाया जा सकेगा। .

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By न्यूज़ डेस्क

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