प्रखंड के कौशिकीपुर-सहौरा और मदौरानी पंचायत के 1000 कटाव पीड़ित परिवार 32 साल से रेलवे ट्रैक के किनारे झोपड़ी और पॉलिथीन टांग कर जिंदगी गुजारने को विवश हैं। 1987 में आई बाढ़ में इनकी जमीन और घर कोसी नदी में समा गया था। इसके बाद से ये कटाव पीड़ित विस्थापित की जिंदगी जी रहे हैं। विडंबना यह कि 32 साल बाद भी प्रशासन और सरकार इनकी सुध नहीं ले रही है। जमीन मुहैया कराने के नाम पर इन्हें अब तक कोरा आश्वासन ही मिलता रहा है।
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इससे विस्थापितों में रोष है। योगेंद्र यादव, हियालाल यादव बताते हैं कि 1987 में काेसी नदी में आई प्रलयंकारी बाढ़ ने यहां के लोगों की खुशियां छीन ली। देखते ही देखते, रातों-रात पूरी पंचायत कोसी के गर्भ में समा गया। कोसी के इस रौद्र रूप को देखकर आर्थिक रूप से सुखी संपन्न इस पंचायत के सैकड़ों परिवार के हजारों लोगों का घर बार, उपजाऊ भूमि के अलावे माल मवेशी को कोसी नदी की तेज धारा में बहते देख लोगों का कलेजा कांप उठा था। लेकिन अब तक हमें पुनर्वास के लिए जमीन मुहैया नहीं कराई गई है।
पहले दोनों पंचायतों में दूध की नदियां बहती थीं। मगर अब हालत यह है कि खाने के लाले पड़े हैं। पशुपालन और खेती किसानी ही यहां के लोगों का आय का मुख्य स्रोत था। उस समय यहां के हर किसानों के पास दो दो दर्जन से ज्यादा दुधारू पशु थे। हर दिन यहां हजारों लीटर दूध का उत्पादन होता था। कटिहार, पूर्णिया, नवगछिया आदि शहरों में यहां से बड़े पैमाने पर दूध की आपूर्ति की जाती थी।

विस्थापितों ने कहा- जल्द समस्या का समाधान नहीं हुआ तो करेंगे आंदोलन
विस्थापितों ने बताया कि वे पुनर्वास के लिए प्रशासन से लेकर जनप्रतिनियों और सरकार तक कई बार गुहार लगा चुके हैं। लेकिन अब तक हमें केवल आश्वास ही मिल रहा है। मदरौनी पंचायत के मुखिया अजीत कुमार मुन्ना ने बताया कि अब तो पंचायत का एक चौथाई भाग ही बचा हुआ है। 1995 में पुनर्वास की मांग को लेकर कौशिकीपुर सहौरा पंचायत के लोगों ने आंदोलन किया था। तब तत्कालीन गोपालपुर विधायक आर के राणा की पहल पर प्रशासन ने 125 परिवारों को पुनर्वास के लिए बासगीत पर्चा दिया था। मगर अब भी 1000 कटाव पीड़ितों को जमीन नहीं मिली है। विस्थापितों ने कहा कि अगर सरकार जल्द पुनर्वास की व्यवस्था नहीं करेगी तो हम उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे। इसके अलावा अब हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।

