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मिल जाए उचित बाजार तो
दियारा में मकई की खेती के बाद अब किसान कम लागत में होने वाले अधिक उपज और मुनाफे की ओर बढ़ रहे हैं। इस्माइलपुर का दियारा क्षेत्र एक बार फिर मेंथॉल की खेती की ओर तरफ बढ़ने का प्रयास कर रहा है, लेकिन उन्हें वह बाजार नहीं मिल रहा, जिसकी उन्हें जरुरत है। इस्माइलपुर के दियारा क्षेत्र में करीब 20 एकड़ में किसान इस खेती करते थे मगर उचित मूल्य और सही बाजार नहीं मिलने के कारण यह घटकर 10 एकड़ में ही सिमट कर रह गई है। अगर इन्हें बाजार और खरीदार मिल जाए तो यह किसानों के लिए सबसे ज्यादा फायदा देने वाला होगा। इधर बाढ़ से 6 महीने ग्रसित रहने वाला इस्माइलपुर मक्के की खेती अधिक करता था, लेकिन अब दो फसल मेंथॉल की भी काट लेते हैं। किसानों का कहना हैं कि देखा जाए तो कम लागत पर अधिक मुनाफा होने के कारण उन्हें मेंथाल की खेती फायदे का सौदा लगता है। इसलिए एक बार फिर यह मेंथॉल की खेती बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

खगड़िया-बेगूसराय के मार्केट में बेचना पड़ता है
किसानों की माने तो मेंथॉल की खेती सबसे ज्यादा मेहनत वाली खेती है। लेकिन मुनाफा अधिक होने के बावजूद किसानों को अपनी फसल खगड़िया, बेगूसराय जाकर बेचना पड़ता है। जिससे उन्हें बिचौलिया के माध्यम से मेंथॉल तेल को कंपनी तक पहुंचाना पड़ता है। इसी वजह से उन्हें कम मुनाफा मिलता है। किसानों की माने तो आस-पास के प्रखंड में मेंथॉल उद्योग लग जाए तो उनके लिए खेती में मेंथॉल सबसे बेहतर विकल्प साबित होगा।
बढ़ रही है किसानों में मेंथॉल के प्रति रुचि
इस्माइलपुर के किसान विपिन मंडल जिला परिषद सदस्य, गुडलेश कुमार, संजीव कुमार, सुरेंद्र मंडल ने बताया कि वह मेंथॉल की खेती करीब 20 एकड़ में अन्य किसानों के साथ मिल कर करते थे, मगर उचित मूल्य नहीं मिलने से यह10 एकड़ पर आकर सिमट गई है। यूपी के बाराबंकी से मेंथॉल का बीज लाया जाता है। एक एकड़ में खेती करने में करीब 12 हजार रुपए का खर्च आता है। इसके बाद फसल को आसवन विधि से निकाला जाता है। फिलहाल बाजार में मेंथॉल 900 से 1000 किलो तक मिल रहा है।
यह भाव और भी बढ़ सकता था, लेकिन किसानों का सीधा संपर्क व्यापारियों तक नहीं है जिस कारण अच्छा रेट नहीं मिल पा रहा है और किसानों की मेहनत का सही मुनाफा उन तक नहीं पहुंच पा रहा। वर्ष 2013-14 में मेंथॉल किलो तीन हजार रुपए प्रति किलो बिकता था, मगर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डिमांड कम होने के कारण रेट घट गया और किसान भी धीरे-धीरे खेती छोड़ने लगे।
