ऐसा गांव जहां घरों से छन कर आतीं बांसुरी की मधुर धुनें रोक देगी आपके बढ़ते कदम। पूर्णिया मुख्यालय से 12 किमी दूर कदमगामा रहेकपुर गांव पहुंचते ही बांसुरी की ये मधुर धुनें सुनने को मिल जाती हैं। दरअसल इस गांव में बांसुरी बनाने वाले ऐसे मुस्लिम कारीगरों हैं जो यहां बांसुरी बनाने के बाद उसकी आवाज को दुरुस्त करते हैं। बांसुरी बजाने में ये कारीगर इतने सिद्धहस्त हैं कि सुनकर आप बस मंत्रमुग्ध हो जाएंगे।
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लेकिन दुश्वारी फिर भी जाती नहीं
बांस के कई कोनों को ठोक-पीट करने के बाद एक दिन में पचास के करीब बांसुरी तैयार होती है। गांव के ही मिंटू आफताब सहित अन्य लोगों ने बताया कि अब बांसुरी बनाने और बजाने का कारोबार कम हो गया है। उन्होंने बताया कि आज से दस-पंद्रह साल पहले तक इलाके के हर घर में बांसुरी बनायी और बजायी जाती थी। मगर महंगाई और उचित मूल्य नहीं मिलने की वजह से कारीगर इससे दूर होने लगे।

पहलवानी भी करते थे गांव के लोग
जन्माष्टमी के मौके पर जब संवाददाता कदमगामा रहेकपुर गांव पहुंचे तो वहां पर चौकी पर बांसुरियों से घिरे 50 वर्षीय शाह आरीफ मिले। उन्होंने बांसुरी पर दर्जनों फिल्मी गाने सुनाए। फिर मुस्कुराते हुए कहा कि सिर्फ कलाकार ही नही हैं साहब, पहलवान भी रहे हैं। वो बताते हैं कि किशन भगवान जब धरती पर आए तो बांसुरी ही उनके साथ था। उनकी बांसुरी की धुन पर राधिकाएं नाचती थी। पूरी सृष्टि झूम उठती थी। मगर अब कद्रदान तक नहीं रहा।

शाह आरीफ गांव के अन्य बांसुरी बनाने वाले से अलग हैं। उन्हें हरी प्रसाद चौरसिया, बिस्मिला खान से लेकर आज के संगीत की टूटी-फुटी ही सही जानकारी है। वो बताते हैं कि उनका बेटा अब बांसुरी न बनाने जाता है और न ही बजाने के लिए ही क्योंकि इस व्यवसाय में अब मुनाफा नहीं है और न ही कोई हमारी कला का कद्र ही करते हैं। उन्हें डर है कि उनकी पीढ़ी के जाने के बाद नयी पीढ़ी क्या करेंगी। क्योंकि न तो शारीरिक रुप से कोई मजबूत है और न ही किसी के पास कला है। शाह आरीफ बताते हैं कि हमलोगों के घरों में पढ़ाई का रिवाज कम है। इसलिए डर और अधिक सताता है। उन्होंने बताया कि यदि सरकार ध्यान दे तो फिर किसी भी तरह की परेशानी नहीं आएगी। नयी पीढ़ी के लोग भी इस धंधे में जमकर काम करेंगे।

