भागलपुर. स्वास्थ्य विभाग ने जिला में होने वाले नवजातों की मौत की वजह जानने को कंट्रोल रूम तो बनाया लेकिन मौत के असल कारणों की पड़ताल नहीं हुई। नवजातों की मौत को कम करने के लिए तमाम तरह की ट्रेनिंग व जागरूकता कार्यक्रम में पिछले 10 वर्षों में 50 करोड़ से ज्यादा खर्च हो चुके हैं।

बावजूद इसके विभाग ने अपने कामकाज में बदलाव नहीं किया। जबकि पिछले तीन वर्षों से जिला का कंट्रोल रूम जिला स्वास्थ्य समिति कार्यालय के पास चल रहा है। कंट्रोल रूम में एक फोन और एक रजिस्टर रखा है। फोन पर नवजात की मौत की जानकारी मिलने पर रजिस्टर में केवल मृत्यु की प्रारंभिक वजह लिख ली जाती है।

अब तक संबंधित अस्पतालों या क्षेत्र में जाकर इसकी असल वजह जानने का प्रयास नहीं हुआ। आंकड़े बताते हैं कि 24 नवंबर 2017 से लेकर 17 मार्च 2018 तक 449 बच्चों की मौत हो चुकी है। मतलब हर दिन औसतन चार से पांच बच्चों की मौत हो रही है।

90 लाख सिर्फ कर्मचारियों के वेतन पर कर दिए खर्च : कंट्रोल रूम में आठ फोर्थ ग्रेड स्तर के कर्मचारियों की ड्यूटी लगी है, जिनमें कई ऐसे कर्मचारी हैं जिन्हें स्पष्ट लिखने भी नहीं आता है। इस वजह से रजिस्टर में कई बार मौत की वजह भी स्पष्ट रुप से नहीं लिखे जाते हैं।

एक अनुमान के मुताबिक इनके वेतन पर सिर्फ दो से ढाई लाख रुपए हर महीने खर्च होते हैं। सालाना यह 30 लाख होता है, अगर तीन साल में इसे जोड़ दें तो 90 लाख रुपए सिर्फ वेतन पर खर्च हो चुके हैं। बिजली बिल व टेलिफोन बिल के अलावा अन्य खर्च अलग से है।

भागलपुर जिले में शिशु मृत्यु दर घटाने का बड़ी ही चतुराई से चल रहा है खेल : जिले में शिशु मृत्यु दर कम करने के लिए जिम्मेदारों ने बड़ी ही चतुराई से रिकॉर्ड बनाए। नियमानुसार, जन्म से ही मृत होने वाले बच्चे को शिशु मृत्यु दर में नहीं गिना जाता।

बताया जा रहा है कि जन्म के 30 सेकंड तक यदि बच्चा जीवित है और उसके बाद उसकी मौत होती है तो वह शिशु मृत्यु दर में गिना जाता है। ऐसे में जिम्मेदारों ने बेहद साफ-सुथरा रिकॉर्ड बनाने के लिए जन्म के बाद हुई मृत्यु को इससे दूर कर दिया।

उन्होंने एक ओर 4 माह में हुई 10 बच्चों की मौतों के कारण तो अस्पष्ट बताए, लेकिन एक ओर यह भी लिखा कि जन्म के बाद बच्चा रोया। फिर उसकी जब इलाज के अभाव में मौत हो गई तो जिम्मेदारों ने मौत को जन्म से ही मृत बता दिया।

होना यह चाहिए : बच्चों की मौत की सूचना जिन अस्पतालों या प्रखंडों से आती है, उन इलाके में विभाग को जांच करना चाहिए कि मौत की असल वजह क्या है। अस्पतालों में संसाधनों के अभाव में मौत हुई या घर पर इलाज के अभाव में। संबंधित बच्चों के घर तक आशा या एएनएम की पहुंच थी या नहीं।

होता यह है : कंट्रोल रूम में मौत की सूचना टॉल फ्री नंबर पर आने के बाद एक साधारण रजिस्टर में नोट कर लिया जाता है। इसे महीने के अंत में जिला स्वास्थ्य समिति के कार्यालय में कंप्यूटर में दर्ज कर राज्य मुख्यालय आंकड़ा भेज दिया जाता है। मौत की वजह की पड़ताल नहीं होती।

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By न्यूज़ डेस्क

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