नवगछिया (बिहपुर)। नवगछिया अनुमंडल के बिहपुर प्रखंड के लत्तीपुर गांव में स्थित मां काली मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह मंदिर लगभग 200 वर्ष पुराना ऐतिहासिक धरोहर भी है। इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई है। श्रद्धालु इसे शक्तिपीठ के रूप में जानते हैं।


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मां काली के इस मंदिर में वैदिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से मां काली के दरबार में हाजिरी लगाता है, मां उसकी हर मनोकामना पूरी करती हैं। कहा जाता है कि मां की कृपा से सूनी गोद भी आबाद हो जाती है।


मां की कृपा से जन्मे बच्चों का मंदिर में होता है मुंडन संस्कार

मंदिर के पुजारी शंभू झा बताते हैं कि वर्षों से यह परंपरा रही है कि जिन दंपत्तियों को मां काली की कृपा से संतान की प्राप्ति होती है, वे अपने बच्चों का मुंडन संस्कार इसी मंदिर में ढोल-नगाड़ों और पूजा-विधि के साथ करवाते हैं।
ऐसे अवसर पर पूरा गांव भक्ति-संगीत और आराधना से गूंज उठता है।

पुजारी झा बताते हैं —

“मां काली की महिमा अलौकिक है। जो भक्त सच्चे मन से मां के चरणों में आता है, उसकी कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहती।”


आने वाले छठ पर्व पर होगा विशेष आयोजन

मां काली मंदिर में इस वर्ष छठ पर्व के मौके पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।
२० अक्टूबर की रात 12 बजे वैदिक विधि-विधान से मां काली की नई प्रतिमा स्थापित की जाएगी, जबकि २२ अक्टूबर को प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा।

इस अवसर पर भव्य मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होगा। आसपास के दर्जनों गांवों से श्रद्धालु और कलाकार इसमें शामिल होंगे। मेला क्षेत्र में धार्मिक झांकियां, प्रसाद वितरण और लोकगायन कार्यक्रमों की भी व्यवस्था की जाएगी।


बलि प्रथा का अंत — एक सामाजिक सुधार की मिसाल

गांव के बुजुर्ग सुखदेव यादव बताते हैं कि पुराने समय में इस मंदिर में बलि देने की परंपरा थी।
लगभग 100 वर्ष पूर्व गांव के समाजसेवी लुचो गोढ़ी ने इस अमानवीय प्रथा को समाप्त करवाया।
तब से इस मंदिर में केवल भक्ति-भाव और पूजा-अर्चना के माध्यम से मां काली की आराधना की जाती है।

उन्होंने बताया —

“हमारे पूर्वजों ने मंदिर में मानवीयता और करुणा की भावना को सर्वोपरि रखते हुए बलि प्रथा को खत्म किया। तब से यहां केवल पूजा, भक्ति और शांति की परंपरा जीवित है।”


हर दिन उमड़ती है भक्तों की भीड़

यह मंदिर आज भी भक्ति और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
दूर-दूर से श्रद्धालु मां के दर्शन और आशीर्वाद के लिए यहां पहुंचते हैं।
विशेष रूप से दीपावली और सूर्य षष्ठी (छठ) के दौरान यहां भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है।

मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन पीपल का वृक्ष, मिट्टी की सुगंध और आरती के स्वर एक अलौकिक वातावरण का अनुभव कराते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मंदिर गांव की आत्मा है, और इसके बिना लत्तीपुर की पहचान अधूरी है।


धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समरसता का प्रतीक

मां काली मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता का भी प्रतीक बन चुका है।
हर धर्म और वर्ग के लोग यहां श्रद्धा से पहुंचते हैं।
गांव के युवाओं द्वारा मंदिर परिसर की सफाई, सजावट और भक्तों की सेवा में योगदान देना यहां की परंपरा बन गई है।


मंदिर में गूंजते हैं भक्ति के स्वर

हर सुबह और संध्या के समय मां काली के जयघोष से पूरा इलाका गुंजायमान हो उठता है।
दीपक की लौ, घंटियों की आवाज और भक्तों के मुख से निकलते भजनों से पूरा वातावरण आध्यात्मिकता और शांति से भर जाता है।
यही कारण है कि लत्तीपुर का यह मंदिर नवगछिया-बिहपुर क्षेत्र ही नहीं, बल्कि पूरे भागलपुर जिले में भक्ति का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।

By न्यूज़ डेस्क

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