नवगछिया : आशीष कुमार, कभी स्कूल पढ़ाने के लिए खोले जाते थे, अब मुनाफा कमाने के लिए। कोई रोक-टोक ही नहीं है। सुविधा के नाम पर पैसे लूट लेते हैं और फिर न सुविधाएं मिलती है और न ही पढ़ाई। फीस तो ठीक ही ठीक किताबें, यूनीफॉर्म तक में नहीं छोड़ते। हर साल करीब 20 लाख रुपए तो सिर्फ कमीशनखोरी की भेंट चढ़ जाता है।

स्कूल से आदेश मिलता है कि किताब,यूनिफार्म तथा जुटे मौजे स्कूल से ही खरीदना है। पैरेंट्स विरोध करने जाए कहां, आखिर बच्चों को तो किसी न किसी स्कूल में पढ़ाना ही है। हर स्कूल के यही हाल है। खासकर सीबीएसई से संबद्ध स्कूलों में तो जैसी लूट मचा रखी है संचालकों ने। कोई बोलने-सुनने वाला ही नहीं है। और तो और स्कूल संचालक, वह तो पैरेंट्स से कमाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। फिर चाहे वह कम्प्यूटर के नाम पर हो या अन्य कार्यो में ।

मार्च से स्कूल में नया शिक्षा सत्र शुरू होने से चार महीने पहले ही अभिभावकों को अपनी जेब कटने की चिंता सताने लगी है। पहले भारी-भरकम फीस, फिर किताबों समेत पढ़ाई से जुड़े अन्य सामानों की कीमत का बोझ उनके कंधों पर आने वाला है।  बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के माता-पिता के सपने का स्कूल संचालक फायदा उठाने में लगे हुए हैं। । हर वर्ष निजी स्कूलों के संचालक नियम विरुद्ध बच्चों के बस्तों का बोझ बढ़ा देते हैं। इसमें ऐसी कई किताबें होती हैं, जो बच्चों के लिए उपयोगी नहीं होतीं, लेकिन कमीशन के चक्कर में इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल कर दिया जाता है। इस तरह बच्चों के बस्ते का बोझ घटने की बजाय बढ़ रहा है।

इस पर रोक लगाने के लिए ?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम में कई प्रावधान किए गए हैं, लेकिन इन पर अमल नहीं हो रहा है। दूसरी तरफ जिला शिक्षा विभाग ने नए सत्र में किताबों की कमीशनबाजी के खेल को खत्म करने के लिए अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है। यदि अभी से विभाग नहीं चेता तो इस बार फिर से पुराना खेल शुरू हो जाएगा। इन स्कूल संचालकों की मनमानी पर रोक नहीं लग पाएगी।

सख्त कार्रवाई का प्रावधान ?

अधिनियम में इस तरह की मनमानी करने वाले निजी स्कूल संचालकों पर कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। समय रहते स्कूल संचालक नियमों का पालन नहीं करते, तो उन पर शिक्षा विभाग को नियमानुसार कार्रवाई का अधिकार है। संचालकों द्वारा तय दुकानों से किताबों की बिक्री होती है तो इसकी शिकायत मिलने पर स्कूल की मान्यता भी निरस्त करने का प्रावधान है। फिर चाहे वह स्कूल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड या फिर सीबीएसई पाठ्यक्रम का।

कुछ पुराने और कुछ नए ?

सीबीएसई पैटर्न का सिलेबस एक समान है, लेकिन निजी स्कूलों में पब्लिशर्स राइटर्स की संख्या सैंकड़ों में है। यानी जितने स्कूल, उतने प्रकाशकों की किताबें।

एक ही कक्षा, लेकिन स्कूल अलग तो किताब भी अलग। गणित का पब्लिकेशन गोयल होगा तो इंग्लिश का लॉगमन और हिंदी का ऑक्सफोर्ड। इस तरह स्कूल और डीलर्स मिलकर सेट बनाते हैं। इसमें कुछ बुक्स फेमस पब्लिशर्स की तो कुछ नए पब्लिशर्स की ली जाती हैं। कारण, नए पब्लिशर्स की बुक में सीबीएसई से रिलेटेड कुछ नहीं होता। उनमें जीके, मॉरल साइंस, करंट अफेयर्स, कम्प्यूटर जैसी बुक्स होती हैं। इनकी कीमत बहुत ज्यादा और कमीशन भी 50 फीसदी से ज्यादा होती है। हर बुक स्टोर्स के पास दर्जनों स्कूलों का ठेका है। केंद्रीय विद्यालय में एनसीईआरटी का पहली क्लास का कोर्स 217 रुपए का तो प्राइवेट स्कूल का 1500 रुपए का। बुक डीलर्स के अनुसार स्कूल निजी प्रकाशकों की किताबें इसलिए लेते हैं, क्योंकि उन्हें डीलर्स से 40-50 फीसदी कमीशन मिलता है। स्कूल प्रबंधन बीच में नहीं आता। डीलर कमीशन का खेल सेट कर देते हैं। सत्र शुरू होने से पहले दिसंबर से फरवरी के बीच डीलर के एजेंट सब तय कर चुके होते हैं।

नियम का पालन नहीं ?

हर साल देखने में यह आता है कि निजी स्कूल शिक्षा विभाग के निर्देशों को अनदेखा करते हैं। इससे पालकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है। निजी स्कूल किताबें खरीदने के लिए स्कूलों में ही अभिभावकों को बाध्य करते हैं। जिन्हें विवश होकर अभिभावकों को खरीदना पड़ता है। निजी स्कूलों और प्रकाशकों के मुनाफे के इस खेल में अभिभावक खुद को ठगा सा महसूस करता है। पालकों की मजबूरी हो जाती है कि उन्हें स्कूल से किताबें खरीदनी होती है।

हर साल बढ़ा दी जाती है फीस ?

निजी स्कूलों पर कितनी फीस वृद्धि हो या कितनी फीस रखी जाए, इस संबंध में कोई दिशा निर्देश नहीं है। ज्यादातर स्कूलों में हर साल 10 से 20 फीसदी तक फीस में वृद्धि की जाती है।  जिला शिक्षा अधिकारी ताकिरुद्दीन अहमद का कहना है कि वर्तमान में फीस निर्धारण या कितनी फीस ली जाए, इस संबंध में कोई मानक तय नहीं किए गए हैं। उन्होंने बताया कि जिला में करीब 50 से ज्यादा निजी स्कूल हैं, जिनमें से 8 से अधिक स्कूल सीबीएसई से संबंद्ध हैं। उन्होंने कहा कि अगर फीस निर्धारण के मानक बनते हैं तो अभिभावकों के लिए राहत भरा होगा।

निर्धारित दुकान से नहीं खरीदेंगे तब…

स्कूल, एडमिशन के समय पैरेंट्स को बुक स्टोर्स और ड्रेस की दुकान का विजिटिंग कार्ड देता है। बुक डीलर्स और स्कूल मिलकर हर क्लास का ऐसा सेट तैयार करते हैं जो केवल निर्धारित बुक स्टोर्स पर मिल सके। डीलर्स भी शहर की दुकानों में सप्लाई करने में ये ध्यान रखते हैं कि जिस दुकान से कमीशन सेटिंग नहीं है, उसे किताब न मिल सके। सीबीएसई हर साल सिलेबस नहीं बदलती, लेकिन स्कूल संचालक एक ही क्लास की किताब हर साल बदलते हैं। प्रकाशक भी एक-दूसरे का बखूबी साथ देते हैं। सिलेबस वही रहता है लेकिन एक प्रकाशक की किताब में जो चेप्टर आगे रहता है, दूसरा उसे बीच में कर देता है। सवाल यह है कि क्या एक साल में ही प्रकाशक और किताबों का स्तर अलग हो जाता है?

40 साल से सरकार चुप ?

1975 में निजी विद्यालयों के लिए अधिनियम बना था। सीबीएसई स्कूल 1962 में पूरी तरह अस्तित्व में आ गए थे लेकिन उस समय सीबीएसई बोर्ड के निजी स्कूलों का अस्तित्व नहीं था। लेकिन 1990 के बाद सीबीएसई स्कूलों की संख्या बढ़ती गई, लेकिन किसी भी सरकार ने फीस पर अंकुश नहीं लगाया। इससे स्कूल संचालकों के हौंसले बढ़ते गए और हर साल तमाम तरह की फीसों में इजाफा होता गया। जिले के सीबीएसई स्कूलों की धांधली और लूट में केवल प्राइवेट स्कूल ही शामिल हैं। धांधली की जड़ में सीबीएसई के कानूनी खाके में ही खोट है जिसके अनुसार निजी स्कूलों में एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू करना तो अनिवार्य है लेकिन पाठ्यपुस्तकों के चयन में छूट है। सैद्धांतिक रूप से यह छूट सही है चूंकि एक ही पाठ्यक्रम को अलग-अलग पुस्तकों से पढ़ाया जा सकता है बशर्ते कि स्कूल संचालकों की नियत में खोट न हो। लेकिन जब अधिकांश निजी स्कूलों का मकसद ही मुनाफा कमाना हो गया है (जिसके लिए सरकार ने भी अपनी मौन सहमति दे रखी है) तो फिर निजी प्रकाशकों की पुस्तकें एनसीईआरटी जैसी उम्दा व सस्ती कैसे हो सकती हैं। प्रदेश सरकार यह कहकर बरी नहीं हो सकती कि यह तो केंद्र का मसला है।

📲 Naugachia News WhatsApp Group Join करें
Join Now →

By न्यूज़ डेस्क

न्यूज़ को शेयर करे और कमेंट कर अपनी राय दे.....

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

deneme bonusu
jojobet giriş, jojobet giris, jojobet, jojobet guncel giris
jojobet, jojobet giris, jojobet guncel giris, jojobet giris adresi, jojobet mobil
jojobet, jojobet giris, jojobet guncel giris, jojobet giris adresi, jojobet mobil
jojobet, jojobet giris, jojobet guncel giris, jojobet giris adresi, jojobet mobil
jojobet, jojobet giris, jojobet guncel giris, jojobet giris adresi, jojobet mobil
jojobet, jojobet giris, jojobet guncel giris, jojobet giris adresi, jojobet mobil