उमस भरी गर्मी थी. एक राहगीर साईकिल से नवगछिया बाजार आया था. वह पसीने से तर बतर था. उसके शर्ट भींग चुके थे. वह व्यक्ति गमछे से लगातार अपना चेहरा पोंछ रहा था. वैशाली चौक पर उसने साइकिल रोक और एक दुकान की ओर रुख किया. दुकानदार से बोला ” भैया एक गिलास पानी मिलतै ? दुकानदार ने कहा एक बोतल मिल जाएगा. बिसलरी 20 का होगा और लोकल ब्रांड 15 का, एक दम ठंडा होगा.
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साइकिल सवार व्यक्ति हंसा और बोला ” अबे पनियो किनी क पिबै” कही चापानल छै त बताबो ? दुकानदार ने कहा आपको चापानल रुंगटा विद्यालय में मिलेगा, जा कर पी सकते हैं या किसी होटल में जाकर पानी की मांग करें. हो सकता है


वहां आपको पानी पिला दिया जाय. साइकिल सवार कुछ आगे बढ़ा. मन ही मन विचार कर रहा था. ” केहनो जमाना आबि गेलै, यै बाजार से बढियां त हमरो बहियार. कोय आबो सब कुछ फ्री। वहां त कोय दूधो नय पूछै छै, यहां त पनियो बिकै छै. पानी बिकै लगलै आब दिन दूर नय छै हबा भी बिकतै. सोच सोच कर साइकिल सवार मंद मंद मुस्कुरा रहा था. एक हॉटल एकदम सामने था. साइकिल सवार होटल में घुसा तो काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा क्या चाहिए भैया ? साइकिल सवार ने कहा ” भैया पियास लागलो रहै, एक गिलास पानी मिलतै ? होटल संचालक ने कहा अभी तक मेरे यहाँ काम करने के लिए कोई आदमी नहीं आया है, कैसे आपको पानी पिलवा दूं. ” साइकिल सवार का जवाब था, बड़ी गुण गैभों भैया तन त एक गिलास पानी के भांज लगाय देतिहो. होटल संचालक ने झल्ला कर कहा, कह दिया आपको ! कोई आदमी नहीं है यहां, फिर मैं कैसे पानी पिला दूं. इसके बाद साइकिल सवार ने कहा गोसबै कहने छो भैया, यै म लागलो की छै, तन देर के लेली तोहिं आदमी बनी जा न ह.
इतना ही………………
ऋषव मिश्रा कृष्णा
पत्रकार
प्रभात खबर
नवगछिया
