नवगछिया: अंजनी कश्यप, अपना सपना बच्चे में साकार कर पिता बने मिसाल कोई गायक बनना चाहता था, तो कोई खिलाड़ी। परिस्थितियों के चलते पुलिस अफसर और प्रोफेसर बनने की तमन्ना भी अधूरी रह गई, लेकिन इन पिताओं ने अपने सपने बच्चों में रोप दिए। इनका संकल्प और बच्चों की मेहनत रंग लाई। आज फादर्स डे के मौके पर कुछ ऐसे ही पिताओं की कहानी…

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सिपाही ने बेटी को आईपीएस बनाया
मोनिका भारद्वाज दिल्ली पुलिस में बतौर डीसीपी के तौर पर तैनात हैं। वहीं, उनके पिता देवी दत्त भारद्वाज दिल्ली पुलिस की थर्ड बटालियन में इंस्पेक्टर हैं। हरियाणा निवासी देवी दत्त बताते हैं वे दिल्ली पुलिस में सिपाही के तौर पर भर्ती हुए थे। शादी के बाद तीन बेटियां और दो बेटे का परिवार जिम्मेदारी बन गया। उस दौरान अफसरों को देख बहुत आकर्षित हुआ। तभी मन ही मन ठान लिया कि बेटियों को अधिकारी जरूर बनाऊंगा। जब मोनिका यूपीएससी में चयनित हुई तो छोटी बेटी इंदू भारद्वाज को भी प्रेरित किया। आज वह भी एक्साइज विभाग में अधिकारी है। मेरी सबसे छोटी बेटी भी रेल मंत्रालय में अच्छे पद पर है। मोनिका कहती हैं कि पापा ने मेरे लिए हिमालय का रोल निभाया। आज भी वह दिन याद है जब पापा अपनी 7000 रुपये की तनख्वाह में से 3000 मुझे पढ़ाई के लिए दे देते थे।

दिव्यांग बेटी जेएनयू की प्रोफेसर बनी
जेएनयू में अमेरिकन साहित्य की प्रोफेसर नवनीत सेठी पैदाइशी दिव्यांग हैं। वह 52 साल की हैं और उनके पिता केसर सिंह सेठी 83 साल के। वे कहती हैं कि हमारे समाज में सामान्य बेटियों के लिए भी ऐसा सपना देख पाना मुश्किल होता है जो उन्होंने शारीरिक रूप से अक्षम बेटी के लिए देखा। पापा इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन से कई साल पहले रिटायर हो गए थे लेकिन मेरी खातिर वह आज भी जॉब पर हैं। मुझे याद है एक बार 1983 में मैं पापा के साथ हवाई जहाज से मुंबई से लौट रही थी। दिल्ली एयरपोर्ट में व्हीलचेयर नहीं मिली। कई बार कहने पर भी व्हीलचेयर नहीं आई तो पापा हवाई जहाज के गेट पर अड़कर खड़े हो गए। कहा कि जब तक मेरी बेटी के लिए व्हीलचेयर नहीं आती, मैं किसी को नहीं निकलने दूंगा। आखिर में व्हीलचेयर आने पर ही वह गेट से हटे। तब मेरी आंखों से आंसू निकल आए थे।

पिता के कारण ही खेल पाया विश्वकप
गांव के छोटे से मैदान से विश्वकप खेलने का सपना मेरे पिता ने ही मुझे दिखाया था। उन्होंने हर मुश्किल में मेरा साथ दिया। यह कहना है भारतीय कबड्डी टीम के पूर्व कप्तान राकेश कुमार का। राकेश ने बताया कि 2004 में पहले विश्वकप से कुछ दिन पहले ही उन्हें चोट लग गई थी। तब लगा था कि करियर आगे नहीं बढ़ नहीं पाएगा, लेकिन पिता होशियार सिंह लगातार समझाते रहे और फिटनेस पर काम करने के लिए कहा। इसी का नतीजा था कि मैं विश्वकप खेल पाया। राकेश दिल्ली में निजामपुर गांव से ताल्लुक रखते हैं। राकेश ने बताया कि उनके पिता भी बचपन में कबड्डी खेलते थे। उन्होंने कबड्डी की बारीकियां पिता से ही सीखीं। राकेश ने कहा कि पिता यही सीख देते हैं कि बेहतर इंसान बनो, विवाद में मत पड़ो और जिस खेल से पहचान मिली है उसके प्रति हमेशा ईमानदार रहो।

पिता का बैंड था, बेटा म्यूजिक डायरेक्टर
पार्श्व गायक और म्यूजिक डायरेक्टर अंकित तिवारी का नाम आज किसी पहचान का मोहताज नहीं है। आशिकी-2 फिल्म के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार जीतने वाले अंकित तिवारी का कानुपर की गलियों से दिल्ली और फिर मुंबई तक का सफर बेहद कठिन रहा। अंकित कहते हैं कि उनकी सफलता के पीछे पिता आर के तिवारी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनके पिता भी म्यूजिशियन हैं। छोटे शहर में लोग अपने बच्चों को डॉक्टर या इंजीनियर बनाने का सपना संजोते हैं, लेकिन अंकित के पिता ने बेटे को संगीत सीखने और उसमें बेहतर करने के लिए प्रेरित किया। अंकित ने कहा कि शुरुआत में पता नहीं संगीत की दुनिया में मेरा क्या होगा, लेकिन पिता की हौसला अफजाई की वजह से आज मैं इस मुकाम पर खड़ा हूं। पिता की शिक्षा की बदौलत ही वह बेहतर म्यूजिक डायरेक्टर बन पाए।

बेटे को डॉक्टर बना सपना पूरा किया
वेदप्रकाश बजाज गाजियाबाद के मुरादनगर के एक छोटे से गांव में पले-बढ़े। उनका सपना डॉक्टर बनकर देश की सेवा करना था। गांव में उचित सुविधाओं और मार्गदर्शन के अभाव में वे खुद तो डॉक्टर तो नहीं बन सके, लेकिन उन्होंने बेटे अनुराग बजाज को डॉक्टर बना अपना सपना पूरा किया। वेदप्रकाश बताते हैं कि वे 12वीं में पांच किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे। 12वीं के बाद मेडिकल की परीक्षा देना चाहते थे, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं मिल पाई कि इसके लिए आवेदन कब और कैसे करना होगा। बाद में अनुराग बड़ा हुआ तो वह इंजीनियर बनना चाहता था, लेकिन मां ने जब पिता के डॉक्टर बनने के सपने के बारे में बताया तो इरादा बदल दिया। अनुराग ने दिल्ली से एमबीबीएस की और फिर अमेरिका चले गए। फिलहाल अनुराग पेनस्लवानिया में बतौर डॉक्टर काम कर रहे हैं।

By न्यूज़ डेस्क

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