नारायणपुर प्रखंड की बैकठपुर दुधैला पंचायत के कसमाबाद दियारा में मंगलवार करीब 11: बजे चूल्हे की चिंगारी से विजय मंडल के घर में आग लग गई। पछिया हवा के कारण आग तेजी से फैल गई। इस घटना में फूस के 300 घर जलकर राख हो गए। घटना के समय गांव में कोई पुरुष मौजूद नहीं थे। कुछ लोग खेतों में तो कुछ ईंट-भट्ठे पर काम करने गए थे। इस दौरान एक बच्चे को बचाने में युवक सुरेश मंडल का चेहरा आंशिक रूप से झुलस गया। वहीं 18 मवेशी भी जलकर मर गए। पीड़ितों ने बताया कि घर का एक भी सामान नहीं बचाया जा सका।
पीड़ितों ने बताया कि इस घटना में एक करोड़ से अधिक की संपत्ति का नुकसान हुआ है। सूचना पर अकबरनगर और सुल्तानगंज थाने से दमकल की तीन छोटी गाड़ियां मौके पर पहुंची, लेकिन आग पर काबू नहीं पाया जा सका। तीन घंटे बाद भागलपुर से दो बड़े दमकल पहुंचे। इसके बाद 5 घंटे बाद आग पर काबू पाया गया। आग लगने के बाद महिलाएं और बच्चे घर से किसी तरह जान बचाकर सड़क किनारे भाग गए। घटना की जानकारी पर ग्रामीण भी काम छोड़कर दौड़े-भागे पहुंचे, लेकिन आग की लपटें इतनी तेज थी कि किसी की हिम्मत नहीं हुई कि घर से सामान निकाले। इधर, घटना की जानकारी पर बिहपुर पुलिस के साथ नारायणपुर सीओ अजय सरकार भी पहुंचे। सीओ ने बताया कि 300 घर जले हैं। क्षति का आकलन किया जा रहा है। पीड़ित परिवारों को राहत सामग्री भी उपलब्ध कराई जा रही है।

टापू पर बसा है कसमाबाद गांव
बैकठपुर दुधैला पंचायत के वार्ड 9 और 10 टापू पर बसे हैं। भौगोलिक स्थिति देखें तो यह पंचायत का कसमाबाद गांव नवगछिया अनुमंडल के नारायणपुर प्रखंड का हिस्सा है। मगर थाना भागलपुर के अकबरनगर में पड़ता है। नारायणपुर प्रखंड मुख्यालय से कसमाबाद की दूरी करीब 19 किलोमीटर और अकबरनगर से करीब 8 किलोमीटर है। नारायणपुर आने के लिए यहां के लोगों को नाव से गंगा नदी पार करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर बैकठपुर पंचायत को अकबरनगर से जोड़ दिया जाए तो उन्हें सुविधा होगी।
नारायणपुर प्रखंड की बैकठपुर दुधैला पंचायत के कसमाबाद दियारा में अगलगी की घटना के बाद पीड़ित खुले आसमान के नीचे रहने को विवश हो गए। गंगा नदी के किनारे बसे इस गांव की आबादी करीब 10 हजार है। 34 साल पहले गंगा की कटाव से गांव के 1500 लोगों का घर नदी में विलीन हो गया था। इसके बाद विस्थापित परिवार गंगा के दूसरी छोर पर किसी तरह फूस के मकान बनाकर गुजर-बसर कर रहे थे। इस पंचायत के 9 और 10 वार्ड के रूप में चयनित कर लिया गया। मगर विस्थापितों को यह नहीं पता था कि गंगा की त्रासदी झेलने के बाद उन्हें 35 साल बाद दोबारा इतनी बड़ी त्रासदी झेलनी पड़ेगी। आग ने इन सभी के परिवार को दोबारा सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है। बच्चे, बूढ़े और जवान खुले आसमान के नीचे शरण लिए हुए हैं। कटाव से विस्थापित हुए लोग धीरे-धीरे वार्ड 9 और 10 में बसते चले गए। इस दौरान गांव के 60 परिवारों को सरकार की ओर से इंदिरा आवास की सुविधा मिली।


