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बीते दिनों बिहार के बाढ़ में भागलपुर ज़िले का नवगछिया कस्बा काफी चर्चा में रहा था क्योंकि तब यहां का सारा ‘सिस्टम’ ही ‘डूब’ गया था.

तब नवगछिया कचहरी डूब गई थी. अस्पताल और जेल में भी पानी भर गया था. जिस अहाते में प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के दफ्तर थे, वहां नाव चल रही थी.

इस इलाके में गंगाप्रसाद बांध टूटने के कारण जो बाढ़ आई थी उसके एक महीने गुजरने के बाद भी यहां के लोग अब भी जल-जमाव से परेशान हैं.

नवगछिया नगर पंचायत की वार्ड नंबर 23 की स्मिता सिंह बताती हैं, ”चापाकल अब भी डूबा हुआ है. पीने का पानी लाने हमें नाव से जाना पड़ता है. बच्चे अब भी नाव से ही स्कूल जाते हैं. सामने दुर्गापूजा है, लेकिन लगता है कि हमलोग इस बार मेला देख पाएंगे.”

स्मिता कहती हैं कि बच्चों को नाव से स्कूल भेजते हुए मन में डर बना रहता है क्योंकि पास के एक बच्चे की मौत डूबने से हो गई थी.

जल-जमाव के कारण इलाके में बहुत दिनों तक बिजली सप्लाई भी बंद थी. नवगछिया के भाजपा जिला अध्यक्ष बिनोद कुमार मंडल यह दावा करते हैं कि उनकी पार्टी की कोशिशों से बीते हफ़्ते इलाके में बिजली सप्लाई बहाल हुई है.

दूसरी ओर नवगछिया कोर्ट, अनुमंडल कार्यालय जैसे महत्त्वपूर्ण दफ्तरों के अहाते में पानी जमे होने के कारण सामान्य कार्य अब भी शुरू नहीं हो पाया है.

यहां वकालत करने वाले आलोक रंजन सिंह बताते हैं, ”अब भी कचहरी अहाते में घुटने से ऊपर पानी है. न्यायिक कार्य बाधित है. अभी जमानत और रिमांड के अलावा और कोई काम मुमकिन नहीं हो पा रहा है. हम लोग एक महीने से रोड के किनारे ही छोटे-मोटे काम निपटा रहे हैं.”

हालांकि स्थानीय प्रशासन द्वारा मोटर पंपों से पानी निकालने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी है.

नवगछिया इलाके के पक्की सड़कों के दोनों ओर बसे कई हिस्से अब भी पानी में डूबे हुए हैं. इन सड़कों पर पूरी जिंदगी आबाद दिखाई देती है. सड़कों पर घर बने हैं, अनाज के भरे ड्रम रखे दिखाई देते हैं, ‘जुगाड़ गाड़ी’ पर बना लोगों का बसेरा भी दिखाई देता है.

जगतपुर गांव की रेणु देवी अभी सड़क के किनारे ही सिलाई मशीन लगाकर अपना ‘टेलर’ चला रही हैं. रेणु बताती हैं, ”ठेला पर पन्नी तानी के रहै छिए. घर गिरी गेल छै. काम-धाम तनी-मनी चलै छै. रस्ता-पानी नए छै त लोग कपड़ा सिलाबे ल नै आबे छै.”

यहां के लोग बताते हैं कि नवगछिया तीन ‘क’, केला-कटाव-क्राइम के लिए जाना जाता है. इलाके से गुजरते हुए जल-जमाव के अलावे जो एक जो चीज नजर आती है वो है केले की बर्बाद हुई फसल.

केले की बर्बादी से छोटे से लेकर बड़े किसान सभी परेशान हैं. तेतरी-मकंदपुर सड़के के किनारे बसे गोसाईं गांव के निरंजन मंडल ने तीन कट्टे में केले की फसल लगाई थी.

निरंजन बताते हैं, ”केले का पूरा बयार डूबिए गया है. हम पर डबल मार पड़ा है. एक तो केले की तैयार फसल डूब गई और दूसरा ये कि खेत में पानी भरा रहने के कारण अब इस मौसम में मैं फिर से केले की रोपनी भी नहीं कर पाऊंगा.”

हालांकि प्रशासन ने प्रति हेक्टेयर साढ़े सत्रह हजार रुपए की दर से केला किसानों के लिए मुआवजे की घोषणा की है, लेकिन इलाके के लोग इसे नाकाफी बताते हैं.

स्थानीय पत्रकार ऋषभ मिश्रा कृष्णा के मुताबिक एक हेक्टेयर केले की खेती में कम-से-कम एक लाख रुपए का खर्च आता है.

ऋषभ केले के फसल की बर्बादी के दूसरे प्रभावों के बारे में बताते हुए कहते हैं, ”त्योहारों का मौसम शुरू हो चुका है. खासकर केला किसानों के लिए ये त्योहार फीके ही रहेंगे. बहुत मुमकिन है कि इन किसानों में से बहुतों को पैसे की कमी के कारण अपने बेटियों की शादी भी टालनी पड़े.”

? बीबीसी से साभार

By Rishav Mishra Krishna

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