जैन धर्म के 24वें व अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के चरण तीन बार भागलपुर की धरती पर पड़े हैं। जैन धर्म का पावन महीना वर्षा काल में पड़ने वाला चातुर्मास में आगमन हुआ है।


नवगछिया न्यूज़ WhatsApp Group

नाथनगर स्थित चंपापुरी भारत के प्राचीन सास्कृतिक नगरों में एक था। भगवान ऋषभदेव ने जिन जनपदों की रचना की थी, उसमें अंग भी एक था, जिसकी राजधानी चंपा थी। भगवान महावीर ने तीन बार चंपापुरी में रहकर वर्षा ऋतु में चातुर्मास किया था। बालभद्र जैन द्वारा लिखित व दिगंबर जैन तीर्थ कमेटी, मुंबई द्वारा प्रकाशित ग्रंथ भारत के दिगंबर जैन तीर्थ के द्वितीय भाग में भगवान महावीर के चंपा में आने का उल्लेख है। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर को कठोर तपस्या के बाद ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। वे वषरें तक विभिन्न स्थानों का विहार करते हुए धर्मदर्शना दी।

जैन पुराणों में उल्लेख है कि 12वा पंचकल्याणक चंपानगरी में हुआ। साथ ही सभी 24 तीर्थंकरों का आगमन अंग की धरती पर हो चुका है। वे सही अर्थ में तीर्थंकर थे। तीर्थंकर का अर्थ है : भौतिक अस्तित्व के ऊपर संसार-समुद्र को पार करने के लिए सेतु का काम करनेवाला। आज भी भगवान महावीर के उपदेश उसी तरह शाश्वत हैं, जिस तरह सदियों वर्ष पहले थे।

उस समय चंपा के राजा दधिवाहन थे। भगवान महावीर ने अपने विहार काल में दु:ख, संत्रास, क्लेश, पीड़ा और ताप से मुक्ति के लिए पाच व्रतों के पालन पर जोर दिया था, जिसमें सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह व्रत शामिल है। उन्होंने कहा था कि संसार में दु:ख का कारण है असीमित, अपरिमित इच्छा और परिग्रह की कामना। उन्होंने अहिंसा परमो धर्म और जियो और जीने दो का संदेश जन-जन को दिया। भागलपुर की धरती पर सती चंदनवाला ने भगवान महावीर को आहारदान कराया था।

महावीर जैन धर्म में वर्तमान अवसर्पिणी काल के चौंबीसवें तीर्थंकर है। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था। महावीर को वर्धमान, वीर, अतिवीर और सन्मति भी कहा जाता है। तीस वर्ष की आयु में गृह त्याग करके, उन्होंने एक लंगोटी तक का परिग्रह नहीं रखा। हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया। उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धात बताए, जो है- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य। सभी जैन मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका को इन पंचशील गुणों का पालन करना अनिवार्य है। महावीर ने अपने उपदेशों और प्रवचनों के माध्यम से दुनिया को सही राह दिखाई और मार्गदर्शन किया।

By न्यूज़ डेस्क

न्यूज़ को शेयर करे और कमेंट कर अपनी राय दे.....

Dinamobet
Dinamobet
Dinamobet
Dinamobet
Dinamobet
Dinamobet
Kulisbet
Kulisbet
Dinamobet
Dinamobet
Kulisbet
Kulisbet
Kulisbet giriş
Kulisbet güncel giriş
kralbet
Dinamobet
Dinamobet
Madridbet
Dinamobet
Dinamobet
Kulisbet
Matbet
Matbet