आधुनिकता की दौड़ में गुम होती हरियाली तीज, गांवों से गायब हुए झूले और कजरी के गीत
नवगछिया। भारतीय संस्कृति में तीज-त्योहारों और उनसे जुड़े रीति-रिवाजों का विशेष महत्व रहा है। श्रावण मास में मनाई जाने वाली हरियाली तीज भी कभी ग्रामीण जीवन और महिलाओं की सामूहिक खुशियों का प्रमुख पर्व हुआ करती थी। गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ते थे, महिलाएं समूह में मल्हार और कजरी गीत गाती थीं तथा बच्चे और युवा भी विभिन्न पारंपरिक खेलों में हिस्सा लेते थे। लेकिन आधुनिक जीवनशैली और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच इस पर्व से जुड़ी कई पुरानी परंपराएं अब धीरे-धीरे सिमटती जा रही हैं।
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हरियाली तीज के मौके पर गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ना और महिलाओं की टोली का गीत गाते हुए झूला झूलना कभी आम बात थी। महिलाएं पारंपरिक कजरी और मल्हार गाकर पर्व का आनंद लेती थीं। घरों में बच्चों के लिए तरह-तरह के पकवान बनाए जाते थे और परिवार की महिलाएं तीज की कथा सुनाती थीं।
सुहागी और सिंदारे की परंपरा भी हो रही कमजोर
तीज से जुड़ी कई पारंपरिक रस्मों का भी अपना विशेष महत्व था। नवविवाहिता के लिए ससुराल से सुहागी भेजने और विवाहित महिलाओं के मायके से सिंदारे आने की परंपरा रही है। इन रस्मों के माध्यम से मायके और ससुराल के बीच रिश्तों की मिठास और पारिवारिक जुड़ाव मजबूत होता था।

हालांकि बदलते समय के साथ इन परंपराओं का स्वरूप भी बदल रहा है। व्यस्त जीवनशैली, शहरी प्रभाव और आधुनिक मनोरंजन के साधनों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण नई पीढ़ी का जुड़ाव पारंपरिक रीति-रिवाजों से पहले की तुलना में कम होता जा रहा है।
झूले और कजरी की जगह मोबाइल ने ली
बुजुर्गों का कहना है कि पहले हरियाली तीज गांवों में सामूहिक उत्सव का रूप ले लेती थी। महिलाएं एक जगह एकत्रित होकर घंटों तक गीत गाती थीं। पेड़ों पर पड़े झूले बच्चों और महिलाओं के आकर्षण का केंद्र होते थे। युवा भी कुश्ती, कबड्डी और दौड़ जैसे खेलों में हिस्सा लेते थे।
आज इंटरनेट, मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने मनोरंजन के तरीके बदल दिए हैं। पहले जहां महिलाएं तीज के मौके पर एक-दूसरे के घर जाकर सामूहिक रूप से पर्व मनाती थीं, वहीं अब कई जगहों पर इसका उत्सव व्यक्तिगत तैयारियों और श्रृंगार तक सीमित होता जा रहा है।
बुजुर्गों को याद आते हैं तीज के पुराने दिन
शांति देवी कहती हैं कि पहले भारतीय संस्कृति आपसी भाईचारे और सामूहिक उत्सव का संगम हुआ करती थी। तीज जैसे त्योहारों पर महिलाएं एक जगह जुटती थीं और टोली बनाकर मल्हार व कजरी गीत गाते हुए झूला झूलती थीं। अब त्योहारों में वह सामूहिकता काफी कम दिखाई देती है।
पूनम के अनुसार, बुजुर्गों से तानसेन के गुरु बाबा हरिदास और मल्हार से जुड़ी कई लोककथाएं सुनने को मिलती रही हैं। पहले तीज-त्योहार लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे, लेकिन भागदौड़ भरी जिंदगी में नई पीढ़ी का इन परंपराओं से जुड़ाव कम होता जा रहा है।
शारदा बताती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में हरियाली तीज पर पेड़ों पर झूले पड़ते थे और महिलाएं पूरे उत्साह के साथ पर्व मनाती थीं। अब युवा पीढ़ी धीरे-धीरे इन परंपराओं से दूर होती जा रही है।
मेहंदी तक सिमटती जा रही तीज की रंगत
बदलते दौर में हरियाली तीज के उत्सव का आधुनिक स्वरूप भी देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक गीत, झूले और सामूहिक आयोजन कई क्षेत्रों में कम होते जा रहे हैं। ऐसे में तीज का उत्सव कई जगहों पर हाथों में मेहंदी रचाने, नए कपड़े पहनने और सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने तक सीमित होता दिखाई दे रहा है।
ग्रामीण संस्कृति से जुड़े लोगों का मानना है कि अगर आने वाली पीढ़ी को इन परंपराओं से नहीं जोड़ा गया तो लोकगीत, झूले, सामूहिक तीज आयोजन और इससे जुड़े कई रीति-रिवाज आने वाले समय में केवल किताबों और पुरानी यादों का हिस्सा बनकर रह जाएंगे।
हरियाली तीज केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि महिलाओं के सामूहिक उत्सव, पारिवारिक रिश्तों और लोकसंस्कृति से जुड़ी परंपरा है। इसे जीवित रखने के लिए आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी संभालना जरूरी है।
