नवगछिया: पुरानी सब्जी पट्टी में साक्षात् माँ बिषहरी (मनसा देवी) बिराजमान है यह मंदिर बहुत ही प्राचीन और अद्भुत है जैसे कि माँ यहाँ सदियों से बिराजमान है मंदिर के संयोजक कुणाल गुप्ता ने बताया कि यहाँ माँ की सालो भर पूजा होती है इस मंदिर को हर साल माँ के आगमन पर सजाया जाता है और माता की प्रतिमा स्थिपित होती है लोग दूर दूर से माँ के दर्शन के लिए मंदिर आते है कुछ लोगो का कहना है कि पूरा नवगछिया बाजार नाग ढीह पर बसा है माँ का नवगछिया से बहुत ही पुराना नाता रहा है मंदिर कमिटी ने बताया की अभी रात 8 बजे माली के यहाँ से डाला लाया जायेगा उसके बाद रात करीब 11 बजे से बाला और बिहुला की शादी होगी और शादी के गीत गाये जायेंगे कल दिन भर भक्तो का जमावरा लगा रहेगा और कल रात 8 बजे के करीब बिसर्जन का कार्यक्रम गाजे बाजे के साथ होगा |

माँ की महिमा की कथा

चम्पा नगरी में चन्द्रधर सौदागर नामक एक धनी वैश्य था। वह परम शिव-भक्त था, किन्तु मनसा देवी से उसका बड़ा विरोध था। इसी विरोध के कारण मनसा देवी ने चन्द्रधर के छह पुत्रों को विषधर नागों से डंसवा कर मरवा डाला। सातवें पुत्र लक्ष्मीचंद्र का विवाह उज्जयिनी के धार्मिक साधु नामक वैश्य की परम सुन्दरी साध्वी कन्या बेहुला के साथ हुआ। लक्ष्मीचंद्र की कुण्डली देखकर ज्योतिषियों ने बता दिया था कि विवाह की प्रथम रात्रि में ही सांप के काटने से इसकी मृत्यु हो सकती है। चन्द्रधर ने लोहे का ऐसा मजबूत घर बनवाया, जिसमें वायु भी प्रवेश न कर सके, मगर मनसा देवी ने भवन-निर्माता से छोटा-सा छेद छोड़ देने के लिए कह दिया। विवाह-रात्रि को नागिन ने लक्ष्मीचंद्र को डंस लिया और वह मर गया। सारे घर में शोर मच गया। तब उसकी पत्नी बेहुला ने केले के पौधे की नाव बनवाई और पति के शव को लेकर, उसमें बैठ गई। उसने लाल साड़ी पहन रखी थी और सिन्दूर लगा रखा था। नदी की लहरें उस शव को बहुत दूर ले गईं। वह अपने पति को पुन: जिन्दा करने पर तुली हुई थी। बहुत दिनों तक उसने कुछ नहीं खाया, जिससे उसका शरीर सूख गया था। लक्ष्मीचंद्र के शरीर से दुर्गन्ध भी आने लगी थी। उसके सारे शरीर में कीड़े पड़ गए थे। मात्र उसका कंकाल ही शेष रह गया था।

बेहुला नाव को किनारे की ओर ले चली। उसने वहां एक धोबिन के मुख से तेज टपकते देखा। उसके कठोर तप को देखकर ही मनसा देवी ने उसे वहां भेजा था। उसने बेहुला से कहा, “तुम मेरे साथ देवलोक में चल कर अपने नृत्य से महादेव को रिझा दो तो तुम्हारे पति पुन: जिन्दा हो जाएंगे।” बेहुला ने उसकी सलाह मान ली। वह उसके साथ चल पड़ी पति की अस्थियां उसके वक्षस्थल से चिपकी थीं। वह अपने पति की स्मृति से उन्मत्त होकर नृत्य करने लगी। सारा देव समुदाय द्रवित हो गया। मनसा देवी भी द्रवित हो गईं। लक्ष्मीचंद्र जीवित हो गया और इसके साथ ही बेहुला का नाम अमर हो गया।

