,, किताबों की अवैध बिक्री पर अनुमंडल पदाधिकारी सख्त

नवगछिया : नवगछिया में निजी स्कूलों की मानमानी बेरोकटोक जारी है. ऐसे अभिभावक जो अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का सपना संजोये हैं वे अपना पेट काट कर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए विवश है. निजी स्कूलों में अभिभावकों द्वारा की फीस में या फिर किताबों में रकम को कम करने की गुजारिश की जाती है तो ऐसे विद्यालय प्रबंधन द्वारा स्पष्ट कहा जाता है किसी सरकारी स्कूल में अपने बच्चे का दाखिला करा लो, एक पैसा नहीं लगेगा.
प्रस्तुत है एक केस स्टडी…

केस स्टडी

सुमित कुमार काल्पनिक नाम नवगछिया शहर के एक कॉलनी में किराये के घर में रहते हैं. सुमित नवगछिया बाजार के एक दुकान में नौकरी करते हैं. कमाई उतनी है जिससे किसी तरह परिवार का पेट भर जाता है. घोर आर्थिक विपन्नता में भी वे अन्य अभिभावकों की तरह अपने बच्चों को बेहतर तालीम देने का सपना संजोये हुए हैं. सुमित की पुत्री पास के ही कानवेंट में पढ़ती थी जहां छठी कक्षा से आगे की पढ़ाई नहीं होती है. सुमित की पुत्री की सहेलियां शहर के बड़े स्कूल में दाखिला लेती है. सुमित की पुत्री भी उसी स्कूल में दाखिला लेने का जिद कर बैठती है. उसे पिता और मां दोनों ने बार बार समझाया कि बेटा वहां सिर्फ बड़े लोगों के बच्चे की पढ़ते हैं,

स्कूल की फीस व अन्य खर्च वहन करने में वे सक्षम नहीं हैं. लेकिन सपनों की उड़ान भर रही सुमित की मासूम बिटिया अपने जिद पर बनी हुई थी. अंतत: सुमित उस ख्याति प्राप्त विद्यालय में गया. बच्ची मेधावी थी, वह विद्यालय केटेस्ट में पास हो गयी. अब वहां सातवीं कक्षा में उसके नामांकन की बारी थी. सुमित ने वहां के संचालक से अनुनय विनय किया लेकिन संचालक ने एडमिशन में मामूली छूट देने पर ही सहमती दी. जब अभिभावक सुमित ने बच्चे के सामने अपनी आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए और ज्यादा फीस कम करने की बात कही तो संचालक ने टका सा उत्तर दिया, हाईस्कूल में नामांकन करा लिजिये एक पैसा नहीं लगेगा. यह सुन कर बच्ची के आंखों में आंसू आ गये, वह रोने लगी.

जब अभिभावक ने बच्ची को रोते देखा तो वह भी मन ही मन खूब रोये, एक साहूकार से कर्ज लेकर बच्ची का नामांकन कराया. दो हजार रूपये छूट के बाद तीन हजार रूपये नामांकन और ग्यारह सौ रूपये फीस देने के बाद अब बात किताबों के जुगाड़ पर अटक गयी है. किताब लेने में भी कम से कम पांच हजार रूपये लगेंगे. सुमित कहता है कि इस विद्यालय में अपनी बिटिया को पढ़ाना उसके लिये टेढ़ी खीर है लेकिन बच्ची के आगे वे बेबस हो जाते हैं. सुमित गरीबी रेखा से नीचे का व्यक्ति है, उसका नाम बीपीएल में है लेकिन बिटिया के बड़ी हो जाने के कारण वह राइट टू एजुकेशन का लाभ नहीं ले सका. नवगछिया में विद्यालय के संचालकों का कहना है कि राइट टू एजुकेशन के तहत वे लोग सिर्फ नर्सरी में एडमिशन लेते हैं.

अगल अलग विद्यालयों में कई किताबें एक ही लेकिन छूट अलग अलग

नवगछिया में चल रहे कुछ ख्यातिप्राप्त विद्यालयों में कुछ कॉमन किताबों को निर्धारित किया गया है लेकिन नवगछिया बाजार के एक मात्र निर्धारित दुकान में दोनों किताबों का मूल्य स्कूल प्रबंधन के हिसाब से तय किया जाता है. किसी विद्यालय में पांच फीसदी छूट दी जा रही है तो किसी विद्यालय में दस फीसदी छूट दी जा रही है. अभिभावकों का कहना है कि विद्यालयों द्वारा एक मात्र निर्धारित दुकान में किताब लेने पर उन्हें प्राप्ति रसीद के नाम पर एक कागज के टुकड़ा थमा दिया जाता है. जाहिर हैबेरोक टोक सरकारी टेक्स की भी चोरी हो रही है. आजाद हिंद मोरचा के अध्यक्ष राजेंद्र यादव ने कहा कि निजी स्कूलों की मनमानी तत्काल बंद हो, ऐसे विद्यालयों पर सरकार का नियंत्रण हो, यह ग्रामीण इलाका है, यहां के अधिकांश लोग गरीब है. ऐसे में विद्यालयों में हो रहा दोहन बंद होना चाहिए. अगर इसे बंद नहीं किया गया तो वे आंदोलन करने को बाध्य हो जायेंगे.

कहते हैं एसडीओ

नवगछिया के एसडीओ मुकेश कुमार ने कहा कि अनुमंडल में कितने विद्यालय हैं, इसकी सूचि तैयार करवाने की प्रक्रिया शुरू की जायेगी. इसके बाद स्कूलों पर निरंतर निगरानी की जायेगी. उन्होंने कहा कि पुस्तकों के बिक्री का मामला गंभीर है. इसमें दुकानदारों को परदर्शी होना पड़ेगा. वे

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By Rishav Mishra Krishna

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