पटना: महावीर मदिर सिर्फ पटना ही नहीं, देश के प्रमुख मदिरों में एक है। आमदनी में भी यह उत्तर भारत का दूसरा सबसे ज्यादा आय वाला मदिर है। पटना से तो इसकी पहचान ही जुड़ी है। रामनवमी पर लाखों भक्त न सिर्फ महावीर मदिर में दर्शन करते हैं, बल्कि करोड़ों रुपये का प्रसाद भी चढ़ाते हैं।
महावीर मदिर का इतिहास करीब तीन सौ साल पुराना है। सन् 1713 से 1730 के बीच स्वामी बालानद के नेतृत्व में इस मदिर की नींव पड़ी। पहले यह मदिर बहुत छोटा था। 1985 में मदिर को इसका विशाल भवन मिला। मदिर निर्माण में न केवल शहर के लोगों ने चदा दिया बल्कि कारसेवा भी की।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने दान दी थी जमीन
महावीर मदिर न्यास के सचिव आचार्य किशोर कुणाल बताते हैं कि मदिर के निमार्ण के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने जमीन दान में थी। पहले इस मदिर के पूर्व छोर का हिस्सा टेढ़ा था मगर हमलोगों ने रेलवे प्रशासन से लड़ाई लड़कर प्रवेश द्वार के रास्ते को सीधा किया।

बदला गया रेलवे लाइन का रास्ता
ब्रिटिश सरकार के एक इंजीनियर को हावड़ा से पटना जंक्शन होते हुए वाराणसी तक रेलवे लाइन बिछाने का जिम्मा मिला। पटना जंक्शन तक रेलवे लाइन बिछाने के क्रम में महावीर मदिर बीच में पड़ रहा था। इंजीनियर ने सरकार को बताया कि रेलवे लाइन बिछाने के लिए मदिर को तोड़ना अनिवार्य है। यह खबर जैसे ही आम लोगों को लगी तो उन्होंने हंगामा शुरू कर दिया। स्थानीय बाशिदों ने ब्रिटिश समय के तत्कालीन जिलाधिकारी के पास भी गुहार लगाई। कहा गया कि इससे पहले बख्तियार खिलजी ने इस मदिर को ध्वस्त कर दिया था। अब दोबारा से मदिर तोड़ने नहीं दिया जाएगा। जिलाधिकारी ने जन भावना का सम्मान करते हुए रेलवे लाइन बिछाने का रास्ता बदल दिया।
कोर्ट में लड़ी गई मदिर के हक की लड़ाई
आचार्य किशोर कुणाल बताते हैं कि महावीर मदिर की स्थापना में अलखिया बाबा ने प्रमुख भूमिका निभाई थी मगर 1934 में उनके वशजों ने इस मदिर को प्राइवेट ट्रस्ट बताकर विवाद खड़ा कर दिया। इस बात को लेकर लोगों ने कोर्ट में केस दर्ज कराया। साल 1936 से लेकर 1948 इस मामले की सुनवाई चली। साल 1948 में पटना हाई कोर्ट ने इस मदिर को सार्वजनिक मदिर घोषित किया। उस समय पटना हाई कोर्ट के जस्टिस बीपी सिन्हा व महावीर प्रसाद की बेंच ने मदिर को निजी नहीं बल्कि सार्वजनिक बताया। साल 1952 में धार्मिक न्यास बोर्ड का गठन किया गया। 1955 तक धार्मिक न्यास बोर्ड और ट्रस्ट के बीच विवाद चलता रहा। 1956 में बोर्ड और ट्रस्ट के बीच इस बात पर समझौता हुआ कि यदि ट्रस्ट मदिर के हित में कोई कार्य करेगा तो बोर्ड उसमें दखल नहीं देगा। हालांकि मदिर में मठाधीसी और भ्रष्टाचार जारी रहा। आचार्य कुणाल बताते हैं, मदिर से जो कमाई हो रही थी, उसे बहुत कम बताया जा रहा था। मैंने फैसला कर लिया था कि यदि न्याय नहीं मिला तो आइपीएस की नौकरी से इस्तीफा दे दूंगा। बाद में सुप्रीम कोर्ट से हमारी जीत हुई।
तब एसएसपी को मिली मदिर निर्माण की जिम्मेदारी
आचार्य किशोर कुणाल बताते हैं, साल 1983-84 के दौरान जब मैं पटना का एसएसपी था तो स्थानीय लोगों ने मदिर निर्माण करने के लिए मुझसे सपर्क किया। पहले तो मैंने मना किया लेकिन बाद में मदिर के निर्माण के लिए शहर के प्रतिष्ठित लोगों की समिति बनाई। एमके सिन्हा अध्यक्ष बनाए गए। स्वतत्रता सेनानी देवेंद्र प्रसाद सिह सचिव बने। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश नद लाल उटवालिया को भी समिति में शामिल किया। सब जगह विज्ञापन लगवाया गया कि यदि इस मदिर के निर्माण के लिए कोई चदा माग रहा हो तो उसे पुलिस को सौंपें। आचार्य किशोर कुणाल बताते हैं, हमलोगों ने आम लोगों से अपील की कि अगर वे चाहते हैं कि मदिर बने तो वे एसबीआइ के फला खाता नबर में रुपये जमा करें। पाच हजार या उससे अधिक दान देने वालों के माता-पिता का नाम मदिर में लगवाया जाएगा। इसके बाद मदिर के प्रवेश द्वारा पर दान पेटी लगाई गई। दर्शन करने आने वाले भक्त इसमें श्रद्धा से पैसे जमा करते थे हालाकि ये चढ़ावा महंत जी ही ले लेते थे। 30 नवबर 1983 को बतौर पटना एसएसपी मैंने इस मदिर का शिलान्यास किया। इसके बाद जोर-शोर से मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ।
तिरुपति बालाजी के कारीगर तैयार करते हैं नैवेद्यम
साल 1992 में महावीर मदिर में भगवान हनुमान को भोग लगाने के लिए नैवेद्यम का प्रसाद मिलना शुरू हुआ। उस समय तिरुपति बालाजी मदिर के कुछ कारीगर इस करार पर आए थे कि यहा के लोगों को नैवेद्यम बनाने का प्रशिक्षण देने के बाद वे लौट जाएंगे मगर यहा की व्यवस्था देखकर आज भी बालाजी मदिर के 40 कारीगर हमारे साथ काम कर रहे हैं। शुरुआत में इन्हें रहने-खाने के साथ पाच हजार रुपए मासिक वेतन मिलता था मगर अब नैवेद्यम की बिक्री से होने वाली आय का दस प्रतिशत इन्हें दिया जाता है। इससे उनके अंदर अधिक नैवेद्यम तैयार करने का उत्साह रहता है।
मंदिर की आय से अस्पतालों का होता है सचालन
महावीर मदिर कमाई के मामले में उत्तर भारत में दूसरे स्थान पर है। उत्तर भारत में जम्मू के वैष्णो देवी मदिर के बाद सबसे अधिक महावीर मदिर की आय है। आचार्य किशोर कुणाल कहते हैं, हमने मदिर की कमाई में पूरी पारदर्शिता रखी है। भारत में कई ऐसे मदिर हैं, जिनकी कमाई महावीर मदिर से अधिक हो सकती है, लेकिन वे असली कमाई घोषित नहीं करते हैं। महावीर मदिर की कमाई से महावीर कैंसर सस्थान, महावीर वात्सल्य, महावीर आरोग्य सस्थान व नेत्रालय आदि का सचालन होता है। महावीर कैंसर अस्पताल में मरीजों को तीनों टाइम का खाना मुफ्त मिलता है। सामान्य मरीजों को भर्ती होते ही दस हजार रुपए व गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले मरीज को 15 हजार रुपए इलाज के लिए दिए जाते हैं।
आमलोगों ने कारसेवा कर बनाया मंदिर का शिखर
आचार्य कुणाल बताते है, महावीर मदिर के वर्तमान स्वरूप का उद्घाटन पाच मार्च 1985 को हुआ। रोचक बात यह है कि मदिर का निर्माण तो मिस्त्री और मजदूरों ने किया मगर मदिर के शिखर का निर्माण आम लोगों ने कार सेवा में भाग लेकर पूरी श्रद्धा से किया। मदिर के शिखर के निर्माण में आम लोगों ने मजदूर बनकर काम किया।


