14 मार्च को सूर्य मीन राशि में गोचर करनेवाले हैं। सूर्य का मीन राशि में आना धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है लेकिन सांसारिक कर्मों की दृष्टि से इसको अच्छा नहीं माना जाता है। यही वजह है कि इसे खरमास के नाम से जाना जाता है।

होली से आठ दिन पहले होलष्टक लग जाता है। अयोध्यागंज बाजार स्थित माता वैष्णवी देवी मंदिर के आचार्य अंजनी कुमार ठाकुर ने बताया कि जब-जब खरमास और होलष्टक लगते हैं तब तब कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं।

क्या होता है खरमास: आचार्य ठाकुर के अनुसार सूर्य जब-जब देवताओं के गुरु वृहस्पति देव की राशि धनु या मीन में आते हैं, तब तक खरमास लगता है। इसे मलेमास के नाम से भी जाना जाता है। 14 मार्च से शुरू होनेवाला खरमास 14 अप्रैल तक चलेगा। क्योंकि सूर्य एक माह के लिए एक राशि में रहते हैं। सूर्य 14 अप्रैल को मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश कर जायेंगे और फिर उसके बाद खरमास समाप्त हो जाएगा। फिर 15 अप्रैल से वैवाहिक कार्यक्रम शुरू हो सकेंगे।

क्यों नहीं होते मलेमास में मांगलिक कार्य: आचार्य ने बताया कि हिन्दू धर्म के मांगलिक कार्यक्रमों में वृहस्पति ग्रह का विशेष महत्व होता है। लेकिन सूर्य का प्रभाव पड़ने से बृहस्पति की सक्रियता बिल्कुल न्यून हो जाती है और इस अवस्था को मलमास व खरमास के नाम से जाना जाता है। इसलिए इसमें कोई मांगलिक कार्य जैसे नामाकरण, विवाह, यज्ञ आदि धार्मिक संस्कार या फिर शुभ कार्य शुरू नहीं किया जाताञ मलमास को मलिनमास भी कहा जाता है और इस मास में सूर्य की उपासना करना बहुत शुभ माना जाता है।

क्या होता है होलष्टक : होली से आठ दिन पहले होलष्टक लग जाता है और होली जलने के बाद यह खत्म होता है। इस दौरान कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित बताया गया है। ठाकुर के अनुसार फाल्गुन मास की शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तिथि तक की अवधि होलष्टक कही जाती है। इस बार होलाष्टक 22 मार्च से लग जायेंगे जो 28 मार्च तक यानि होलिका दहन तक प्रभावी रहेगा। 29 मार्च को चैत्र प्रतिपदा के दिन रंगोत्सव मनाया जायेगा, जिसे धुलैंडी के नाम से जाना जाता है।

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By न्यूज़ डेस्क

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