नवगछिया (भागलपुर) : गंगा और कोसी की धारा के बीच स्थित नवगछिया हमेशा से धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। इसी धरती पर बसा है पुनामा प्रतापनगर का प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर, जिसकी महिमा निराली है। यहां शक्ति की साधना किसी आम मंदिर जैसी नहीं, बल्कि तंत्र परंपरा से जुड़ी है। यही कारण है कि यह मंदिर इतिहास, तंत्र और आस्था का अद्वितीय संगम माना जाता है।

प्रतिमा नहीं, ज्योत और कलश की पूजा

मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां देवी की प्रतिमा नहीं स्थापित है। भक्तगण ज्योत और कलश की आराधना करते हैं। दुर्गा पूजा की शुरुआत होते ही ज्योत प्रज्वलित की जाती है और यह दशमी तक निरंतर जलती रहती है। विसर्जन के दिन भक्तों की भीड़ के बीच इस ज्योत का विसर्जन किया जाता है।

महिलाओं का प्रवेश वर्जित

इस मंदिर का एक और अनूठा नियम है—यहां महिलाओं का प्रवेश निषिद्ध है। मंदिर के प्रबंधक परिवार के सदस्य बताते हैं कि 1526 में स्थापना काल से ही यहां तांत्रिक विधि से पूजा होती रही है। तांत्रिक साधना की विशिष्टता और परंपरा को बनाए रखने के लिए महिलाओं को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं है।

1526 से चली आ रही परंपरा

ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, राजा चंदेल वंश के प्रताप राव ने 1526 में इस मंदिर की नींव रखी थी। तब से यह मंदिर स्थानीय शासकों और भक्तों की आस्था का केंद्र रहा। वर्तमान में राजा प्रताप राव के वंशज—प्रवीण सिंह, जितेंद्र सिंह, विजयेंद्र सिंह और चन्द्र मोलेश्वरी सिंह इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

कोसी के कटाव से तीन बार उजड़ा, फिर भी आस्था अडिग

कहा जाता है कि कोसी नदी के कटाव में यह मंदिर तीन बार बह गया, लेकिन आस्था अटल रही। अंततः वर्ष 2003 में इसे राजेंद्र कॉलोनी, पुनामा में पुनः स्थापित किया गया। आज यह मंदिर नवगछिया और आसपास के क्षेत्रों का प्रमुख शक्ति केंद्र है।

कामरूप कामाख्या जैसी तांत्रिक साधना

मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां पूजा-पाठ कामरूप कामाख्या की परंपरा की तरह तांत्रिक विधियों से की जाती है। यही कारण है कि दुर्गा पूजा के दौरान यह स्थान साधकों और श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

बलि प्रथा आज भी प्रचलित

मंदिर में बलि प्रथा आज भी कायम है। अष्टमी और नवमी को विशेष बलि दी जाती है। नवमी के दिन भैंसे की बलि भी चढ़ाई जाती है। इसके अलावा पहली, तीसरी, पांचवीं और सातवीं पूजा के अवसर पर भी एक-एक पशु की बलि दी जाती है।

भव्य निशा पूजा और चौसठ योगिनी साधना

सप्तमी की रात होने वाली निशा पूजा यहां का सबसे बड़ा आकर्षण है। इस अवसर पर चौंसठ योगिनी की पूजा की जाती है। यह परंपरा तंत्र साधना से जुड़ी है और मान्यता है कि इस पूजा से देवी के सभी रूपों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस अद्भुत अनुष्ठान को देखने के लिए दूर-दराज़ से श्रद्धालु और साधक यहां पहुंचते हैं।

मन्नत और दंड प्रथा

मंदिर में भक्त अपनी मनोकामनाएं पूरी होने की मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी हो जाने पर भक्त मंदिर परिसर की परिक्रमा करते हुए भूमि पर लेटकर दंड लगाते हैं। यह अनोखी परंपरा यहां की गहरी आस्था को दर्शाती है।

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By न्यूज़ डेस्क

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