भागलपुर, गरुड़ प्रजनन क्षेत्र का लगातार विस्तार हो रहा है। इस कारण इनकी संख्या भी बढ़ रही है। इस बार गरुड़ों ने अपना घोंसला पूर्णिया, मधेपुरा, खगड़िया जिले की नयी जगहों पर बनाया था। पूर्णिया व मधेपुरा में पीपल तो खगड़िया में सेमल के पेड़ पर घोंसला बनाकर बच्चे दिये। इनका प्रजनन सिंतबर से मार्च तक होता है। इंडियन बर्ड कंजर्वेशन नेटवर्क के स्टेट को-ऑर्डिनेटर अरविंद मिश्रा ने बताया कि नयी जगहों पर प्रजनन होने से इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। इस कारण कदवा दियारा में अभी 600 से 650 के आसपास इनकी संख्या है। गरुड़ के एक बच्चे का वजन जन्म लेने के समय नौ से दस किलो के आसपास होता है। छोटे बच्चे के भोजन के लिए माता-पिता मछली, चूहा, सांप आदि को अपने पेट में लेकर आते हैं और घोंसला में उलट देते हैं। इसके बाद वह भोजन ग्रहण करता है।

पारिस्थिति तंत्र के संरक्षण में योगदान

गरुड़ का पारिस्थिति तंत्र के संरक्षण में भी योगदान है। वो सड़ा-गला लाश आदि को खाता है। भागलपुर व बांका के पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. संजीत कुमार ने बताया कि भागलपुर में भोजन की पर्याप्त उपलब्धता व मौसम अनुकूल होने से यहां इनकी संख्या बढ़ रही है। जबकि असम में गरुड़ की संख्या नहीं बढ़ पा रही है। वहां गरुड़ सड़ा-गला लाश खाते नजर आते हैं। उन्होंने बताया कि देश में भागलपुर व असम के बाद विदेश में कंबोडिया में ही गरुड़ पाये जाते हैं। जबकि पहले नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, थाईलैंड, दक्षिणी वियतनाम आदि जगहों पर गरुड़ मिलते थे। जो अभी वहां विलुप्त हो चुके हैं।

कई पेड़ों पर बनाते हैं घोंसला

कदवा दियारा में गरुड़ ऊंचे-ऊंचे बरगद, पीपल, सेमल, कदंब, पाकड़ आदि के पेड़ों पर घोंसला बना रखे हैं। पक्षी वैज्ञानिक मानते हैं कि अपेक्षित वातावरण, भोजन और पानी की सुलभता की वजह से गरुड़ यहां रहना पसंद करते हैं।

गरुड़ के संरक्षण के लिए सुंदरवन में है पुर्नवास केंद्र

गरुड़ के संरक्षण के लिए सुंदरवन में गरुड़ पुर्नवास केंद्र की स्थापना 2014 में की गयी थी। डॉ. संजीत के अनुसार कोई गरुड़ अगर पेड़ से गिरकर आता है तो यहां उसका इलाज किया जाता है। ठीक होने के बाद उसे प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाता है। अभी तक 70 से अधिक गरुड़ को प्राकृतिक आवास में छोड़ा जा चुका है।

अब गरुड़ की मौत बिजली करंट से नहीं होगी

अब गरुड़ की मौत बिजली के करंट से नहीं होगी। हाल-फिलहाल कुछ गरुड़ की मौत करंट लगने से हो गयी थी। इंडियन बर्ड कंजर्वेशन नेटवर्क के स्टेट को-ऑर्डिनेटर ने बताया कि वन व पर्यावरण विभाग के प्रधान सचिव दीपक कुमार सिंह से मुलाकात कर बिजली के तार को अंडरग्राउंड कराने का आग्रह किया था। इसके बाद वहां के 500 मीटर तार अंडरग्राडंड हो चुका है। 150 मीटर तार को कवर किया गया। उन्होंने बताया कि कदवा दियारा में 11 हजार वोल्ट का तार है।

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By न्यूज़ डेस्क

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