भागलपुर । काली पूजा सोमवार को है। सिंह लग्न में सोमवार की देर रात मां काली की प्रतिमा बेदी पर स्थापित होंगी। सूर्यग्रहण लगने के कारण अहले सुबह 4:42 के बाद मंदिर का पट बंद हो जायेगा। जो 25 अक्टूबर की शाम 5:30 बजे खुलेगा। इसके बाद मां काली की पूजा-अर्चना की जाएगी। परबत्ती, इशाकचक, मोमिन टोला, हबीबपुर में बुढ़िया काली, रिकाबगंज में नवयुगी काली, उर्दू बाजार व बूढ़ानाथ में मसानी काली, बरमसिया काली, रति काली, जुबली काली, बमकाली आदि नामों से जानी जाती है। इन सभी जगहों पर प्रतिमा का निर्माण पूरा हो चुका है।
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नवयुगी काली मंदिर समिति द्वारा रिकाबगंज में आकर्षक लाइट की व्यवस्था की गयी है। जबकि मंदरोजा काली पूजा समिति की ओर से कोतवाली चौक के पास मथुरा का तोरण द्वार बनाया गया है। इसके अलावा भीखनपुर में राम मंदिर का पंडाल बनाया गया है। मंदरोजा काली मंदिर के ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज कुमार मिश्रा ने बताया कि 24 अक्टूबर की रात में मां काली बेदी पर स्थापित होंगी। 25 अक्टूबर को अहले सुबह 4:42 के बाद मंदिर का पट बंद हो जायेगा। जो शाम 5:30 बजे खुलेगी। उसके बाद यहां पूजा-पाठ व आरती होगी। 26 अक्टूबर को खिचड़ी, खीर व हलुआ का भोग लगाया जायेगा। उन्होंने बताया कि सोमवार के दिन अमावस्या संध्या 5:17 से शुरू होगा जो 25 अक्टूबर मंगलवार के दिन संध्या 4:46 तक रहेगा।
विसर्जन शोभायात्रा 26 की रात से होगी शुरू
कालीपूजा महासमिति काली पूजा की तैयारी में जुट गया है। अध्यक्ष ब्रजेश साह ने बताया कि विसर्जन शोभायात्रा 26 अक्टूबर की रात से शुरू होगी। जो समापन 27 अक्टूबर की देर रात होगी। सभी प्रतिमाओं का विसर्जन कृत्रिम तालाब में किया जायेगा। प्रवक्ता गिरीश चंद्र भगत ने बताया कि इस बार 100 से अधिक जगहों पर प्रतिमाएं बेदी पर स्थापित होंगी। विसर्जन शोभायात्रा में 79 प्रतिमाएं शामिल होने की संभावना है। जिसमें पूर्वी क्षेत्र से 17, पश्चिमी क्षेत्र से 18, दक्षिणी क्षेत्र से 18, उत्तरी क्षेत्रा से सबसे अधिक 26 प्रतिमाएं शामिल होंगी। उन्होंने बताया कि विसर्जन शोभायात्रा में सबसे आगे परबत्ती की बुढ़िया काली व सबसे पीछे जोगसर की बमकाली की प्रतिमा रहेगी।

1954 में पहली बार निकली थी विसर्जन शोभायात्रा
काली महारानी केंद्रीय महासमिति के उपाध्यक्ष जयनंदन आचार्य ने बताया कि भागलपुर में 250-300 वर्ष पूर्व से मां काली की पूजा होती है। प्रतिमा की शोभायात्रा 1954 से निकाली गयी। उस समय विजर्सन में मात्र 19 प्रतिमाएं शामिल हुई थीं। इसके एक साल बाद 1955 में प्रतिमा की संख्या बढ़कर 30 हो गयी। अब अब 80 प्रतिमाएं शोभायात्रा में चलती हैं।
